मथुरा के फरह क्षेत्र के पौरी और शहजादपुर गांवों में तस्वीर बेहद डरावनी है। यहाँ का भूजल इतना खारा हो चुका है कि न तो इंसान उसे पी सकते हैं और न ही जानवर। मीठे पानी की एक बूंद के लिए यहां के ग्रामीण रोजाना अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सड़कों पर बिताने को मजबूर हैं।
रोजाना का संघर्ष: दो किलोमीटर का सफर
पौरी और शहजादपुर के लोग सुबह होते ही सिर पर खाली मटके और प्लास्टिक के डिब्बे लेकर मीठे पानी की तलाश में निकल पड़ते हैं। भीषण गर्मी और तपती धूप में महिलाओं और बच्चों को दो से तीन किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। हालात इतने बदतर हैं कि गांवों के मवेशी भी खारा पानी पीने से परहेज कर रहे हैं, जिससे पशुपालन पर भी संकट मंडराने लगा है।
सरकारी दावों और हकीकत का अंतर
सरकार की ‘हर घर नल’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं कागजों में भले ही जल की समस्या खत्म करने का दावा कर रही हों, लेकिन इन गांवों की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि न तो पाइपलाइन का काम पूरा हुआ है और न ही पानी के शोधन की कोई व्यवस्था की गई है। जनप्रतिनिधियों के वादे चुनाव के बाद अक्सर ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
मायने और प्रभाव
इस जल संकट का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है।
- स्वास्थ्य पर असर: खारा पानी पीने से क्षेत्र में किडनी और पेट संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
- आर्थिक बोझ: पानी ढोने में समय बर्बाद होने के कारण बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं का अन्य घरेलू कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
- पशुधन का नुकसान: ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य आधार पशुपालन है, जो जल संकट के कारण अब बर्बादी की कगार पर है।
समय आ गया है कि प्रशासन इसे महज एक खबर न मानकर त्वरित कार्रवाई करे, क्योंकि पानी का अधिकार केवल एक संवैधानिक हक ही नहीं, बल्कि जीने की बुनियादी शर्त है।



