उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में शारदा नदी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। निघासन क्षेत्र के ग्रंट नंबर-12 गांव में बुधवार को शारदा नदी की लहरों ने तबाही का नया मंजर पेश किया, जब गांव का संविलियन विद्यालय देखते ही देखते नदी की भेंट चढ़ गया।
स्कूल की इमारत गिरी, ग्रामीणों में दहशत
नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण स्कूल का एक बड़ा हिस्सा अचानक नदी में समा गया। अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली डामर सड़क भी कटान की चपेट में है। ग्रामीणों का कहना है कि शारदा नदी पिछले तीन सालों से उनके गांव के अस्तित्व को मिटाने पर तुली है, लेकिन सरकारी स्तर पर ठोस सुरक्षा इंतजाम अब भी नदारद हैं।
खतरे के निशान से ऊपर बह रही शारदा
शारदा नदी का जलस्तर पलियाकलां में खतरे के निशान (154.590 मीटर) को पार कर 154.690 मीटर तक पहुंच चुका है। लगातार बढ़ रहे जलस्तर के चलते मझौरा से इमलिया जाने वाला मुख्य मार्ग पूरी तरह बंद हो गया है, जिससे करीब एक दर्जन गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कट गया है।
- सीधा असर: खेतों में पानी भरने से फसलें बर्बाद हो रही हैं।
- सुरक्षा संकट: बड़ी संख्या में परिवार अपना घर छोड़कर तटबंधों पर शरण लेने को मजबूर हैं।
- आक्रोश: स्थायी पुनर्वास की मांग को लेकर ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार तक की चेतावनी दी थी।
मायने और प्रभाव
लखीमपुर खीरी में शारदा नदी का यह कटान महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासन की दीर्घकालिक कार्ययोजना की विफलता को भी दर्शाता है। जब सार्वजनिक संपत्तियां जैसे स्कूल नदी में समाने लगें, तो यह संकेत है कि नदी अब रिहायशी इलाकों के काफी करीब आ चुकी है।
स्थानीय लोगों के लिए यह साल दर साल का संघर्ष है, जहां हर बार बाढ़ के बाद मुआवजा तो मिलता है, लेकिन स्थायी समाधान की कमी उन्हें हर मानसून में बेघर कर देती है। यदि समय रहते कटानरोधी कार्य नहीं किए गए, तो ग्रंट नंबर-12 जैसे गांव आने वाले समय में केवल नक्शों और सरकारी रिकॉर्ड तक ही सीमित रह जाएंगे। प्रशासन के लिए अब चुनौती सिर्फ राहत सामग्री बांटना नहीं, बल्कि इन परिवारों के पुनर्वास और नदी के रुख को मोड़ने की ठोस इंजीनियरिंग तकनीक अपनाने की है।




