उत्तर प्रदेश के खेतों में इस वक्त रबी फसलों की बुवाई का पीक सीजन चल रहा है, लेकिन सूबे के किसान खाद के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। सरकारी सहकारी समितियों के सचिवों ने अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान कर दिया है, जिसका सीधा असर खाद वितरण व्यवस्था पर पड़ा है।
गोदामों में खाद, पर ताले बंद
प्रदेश भर की सहकारी समितियों के दफ्तरों में खाद का स्टॉक तो मौजूद है, लेकिन सचिवों के काम पर न आने की वजह से ताले नहीं खुल पा रहे हैं। किसान सुबह से ही समितियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन खाली हाथ वापस लौटने को मजबूर हैं। बुवाई के समय पर खाद न मिलने से फसल की पैदावार प्रभावित होने का डर किसानों को सता रहा है।
क्यों नाराज हैं सहकारी समिति के सचिव?
सचिवों का कहना है कि उनकी नाराजगी लंबी समय से लंबित मांगों को लेकर है। मुख्य रूप से:
- लंबे समय से रुका हुआ मानदेय भुगतान।
- वेतन विसंगतियों को दूर करने की मांग।
- कार्य की सुरक्षा और पक्की सेवा शर्तों का अभाव।
उनका साफ कहना है कि जब तक सरकार उनकी सुध नहीं लेगी और बकाया भुगतान सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक कामकाज ठप रहेगा।
मायने और प्रभाव: आम किसान पर क्या असर?
इस हड़ताल का असर केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा दंश राज्य का वह छोटा किसान झेल रहा है जो बाजार की महंगी खाद खरीदने में असमर्थ है और पूरी तरह सहकारी समितियों पर निर्भर है।
क्यों है यह चिंताजनक? रबी की फसल जैसे गेहूं और सरसों के लिए शुरुआती खाद बहुत जरूरी है। यदि यह समय निकल गया, तो इसका सीधा असर पैदावार पर पड़ेगा, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की कमाई दोनों पर संकट आ सकता है। सरकार को जल्द ही सचिवों के साथ संवाद स्थापित कर इस गतिरोध को खत्म करना होगा, वरना आने वाले दिनों में यह संकट बड़ा रूप ले सकता है।



