उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे चुनाव की आहट तेज हो रही है, सत्ताधारी गठबंधन एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे का ‘गणित’ शुरू हो गया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के मुखिया ओपी राजभर ने एक बार फिर अपनी ताकत का एहसास कराते हुए उन सीटों की सूची पर काम शुरू कर दिया है, जहाँ वे अपने उम्मीदवार उतारना चाहते हैं।
राजभर की नजरें किन सीटों पर?
ओपी राजभर की पार्टी पूर्वांचल की उन सीटों पर खास जोर दे रही है, जहाँ राजभर और चौहान वोट बैंक का दबदबा है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने मऊ, बलिया, गाजीपुर और वाराणसी के आसपास की कई विधानसभा सीटों को अपनी ‘विश लिस्ट’ में शामिल किया है। राजभर का तर्क है कि इन क्षेत्रों में उनके प्रत्याशी न केवल अपनी बिरादरी के वोटों को एकजुट कर सकते हैं, बल्कि गठबंधन की जीत का अंतर भी बढ़ा सकते हैं।
मोलभाव की रणनीति और दबाव
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राजभर की यह कवायद सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि गठबंधन में अपना ‘कद’ सुरक्षित करने के लिए है। वे जानते हैं कि चुनाव से ठीक पहले गठबंधन के भीतर अपनी जमीन मजबूत करना कितना जरूरी है। उन्होंने साफ संकेत दे दिए हैं कि पार्टी कार्यकर्ता जमीन पर सक्रिय हैं और वे किसी भी हाल में अपनी मजबूत दावेदारी वाली सीटों पर समझौता करने के मूड में नहीं हैं।
मायने और प्रभाव
राजभर की इस सक्रियता का सीधा असर एनडीए के बड़े सहयोगियों, विशेषकर भाजपा पर पड़ता है। यह समझना जरूरी है कि:
- वोट बैंक का संतुलन: राजभर जैसे सहयोगी पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक को साधने के लिए एनडीए के लिए अनिवार्य हैं।
- गठबंधन में खींचतान: सीटों का यह मोलभाव अंततः गठबंधन के भीतर सामंजस्य बिठाने की एक बड़ी परीक्षा साबित होगा।
- पूर्वांचल का किला: पूर्वांचल में जीत के लिए इन सीटों का तालमेल एनडीए के लिए गेम चेंजर हो सकता है, यही वजह है कि भाजपा भी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि एनडीए नेतृत्व राजभर की मांगों को किस हद तक स्वीकार करता है और क्या यह गठबंधन बिना किसी ‘विद्रोह’ के चुनाव मैदान में उतर पाता है।





