क्या आपने कभी सोचा है कि बिना खेत और बिना मिट्टी के भी आप लखपति किसान बन सकते हैं? दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने अब इस सपने को हकीकत में बदल दिया है। विश्वविद्यालय के कृषि विभाग ने एक ऐसा ‘स्मार्ट फार्मिंग’ मॉडल तैयार किया है, जो आने वाले समय में पूर्वांचल के किसानों की तकदीर बदल सकता है।
क्या है यह हाइड्रोपोनिक तकनीक?
गोरखपुर यूनिवर्सिटी की लैब में तैयार हो रहा यह मॉडल ‘हाइड्रोपोनिक खेती’ पर आधारित है। इसमें फसलों को मिट्टी में नहीं, बल्कि खास पोषक तत्वों से भरपूर पानी के घोल में उगाया जाता है। यह तकनीक उन किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जिनके पास खेती योग्य जमीन कम है या मिट्टी की गुणवत्ता खराब है।
किन फसलों की होगी खेती?
इस नई तकनीक के जरिए बाजार में महंगी बिकने वाली फसलों को उगाना आसान हो गया है। यूनिवर्सिटी की स्मार्ट नर्सरी में विशेष रूप से इन फसलों पर जोर दिया जा रहा है:
- लेट्यूस (Lettuce)
- चेरी टोमैटो
- रंगीन शिमला मिर्च
- खीरा और स्ट्रॉबेरी
ये सभी सब्जियां और फल बाजार में ₹200 से ₹300 प्रति किलो तक बिकते हैं। कम जगह में इनकी खेती करके किसान पारंपरिक फसलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा कमा सकेंगे।
मायने और प्रभाव: आम किसान के लिए क्यों जरूरी?
इस पहल के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान अब अपने घर की छत या छोटी सी खाली जगह पर भी बड़े पैमाने पर व्यवसायिक खेती कर सकते हैं।
आर्थिक आजादी: यह मॉडल उर्वरकों और कीटनाशकों के खर्च को घटाकर किसानों की जेब में ज्यादा पैसा लाने का काम करेगा।
तकनीकी क्रांति: गोरखपुर यूनिवर्सिटी का यह प्रयास कृषि क्षेत्र में युवाओं को खींचने में मदद करेगा। यदि छोटे किसान इस तकनीक को अपनाते हैं, तो यह न केवल उनकी आय बढ़ाएगा, बल्कि स्थानीय मंडियों में ताजी और जहरीले रसायनों से मुक्त सब्जियां भी उपलब्ध होंगी।


