डिजिटल इंडिया के दौर में जहां हर हाथ में मोबाइल और हर दुकान पर क्यूआर कोड नजर आता है, वहीं बरेली के व्यापारियों ने एक कड़ा रुख अख्तियार किया है। एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) शुल्क को लेकर उपजे विवाद ने अब आंदोलन का रूप ले लिया है। व्यापारियों ने एकजुट होकर आज ‘नो यूपीआई डे’ मनाने का फैसला किया है, जो डिजिटल लेनदेन की दुनिया में एक बड़ी हलचल पैदा कर सकता है।
क्यों मचा है बवाल?
बरेली में उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के पदाधिकारियों और विभिन्न व्यापारिक एसोसिएशनों ने डेलापीर मंडी कार्यालय में एक अहम बैठक की। व्यापारियों का तर्क है कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर लगने वाला एमडीआर शुल्क उनके मुनाफे पर सीधी चोट है। उनका कहना है कि जब सरकार डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने की बात करती है, तो व्यापारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ क्यों डाला जा रहा है?
दुकानों पर दिखेंगे ‘नो यूपीआई’ के पोस्टर
विरोध के इस प्रदर्शन के तहत बरेली के व्यापारियों ने निर्णय लिया है कि आज वे ग्राहकों से डिजिटल पेमेंट की जगह नकद भुगतान की अपील करेंगे। बाजार में कई दुकानों पर आज आपको ‘नो यूपीआई’ के पोस्टर नजर आ सकते हैं। व्यापारियों की मांग है कि एमडीआर शुल्क को पूरी तरह समाप्त किया जाए ताकि छोटे और मझोले दुकानदारों को राहत मिल सके।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
इस विरोध का सीधा असर उन ग्राहकों पर पड़ेगा जो कैशलेस शॉपिंग के आदी हो चुके हैं।
- नकद का चलन: यदि आप आज बरेली के बाजारों में खरीदारी करने जा रहे हैं, तो अपने साथ नकदी रखना बेहतर होगा, क्योंकि दुकानदारों ने यूपीआई का विकल्प बंद करने का मन बना लिया है।
- आर्थिक दबाव: व्यापारियों के लिए एमडीआर शुल्क का मतलब है हर ट्रांजैक्शन पर कुछ हिस्सा बैंक या सर्विस प्रोवाइडर को देना। छोटे मार्जिन वाले कारोबारियों के लिए यह घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
- भविष्य की रणनीति: यह विरोध सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं है, यह देश भर के व्यापारियों की उस नाराजगी को दर्शाता है जो लंबे समय से डिजिटल पेमेंट गेटवे के ऊंचे चार्जेज से परेशान हैं।
बरेली के व्यापारियों का यह कदम सरकार और बैंकिंग संस्थाओं पर दबाव बनाने की एक कोशिश है। यदि यह गतिरोध बना रहा, तो आने वाले दिनों में डिजिटल पेमेंट के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।



