गोरखपुर की मिट्टी को नई पहचान दे रहीं सुशीला देवी
गोरखपुर के टेराकोटा की ख्याति आज पूरी दुनिया में है, लेकिन इस माटी की खुशबू के पीछे कुछ ऐसी मेहनत छिपी है जो बाजार के चमक-दमक से बिल्कुल अलग है। शहर की सुशीला देवी न केवल टेराकोटा की मूर्तियां बना रही हैं, बल्कि वे एक ऐसी अनोखी कला को जीवित रखे हुए हैं जो पूरी तरह से प्रकृति के करीब है।
सुशीला देवी के हाथों से बनी मूर्तियों में जो चमक दिखती है, वह किसी केमिकल वाले रंग की नहीं, बल्कि उनके घर पर तैयार किए गए ऑर्गेनिक रंगों की है। यह प्रयोग उन्हें दूसरों की भीड़ से अलग खड़ा करता है।
आम की छाल से तैयार होता है खास रंग
सुशीला बताती हैं कि टेराकोटा के लिए पारंपरिक और ऑर्गेनिक रंग तैयार करना एक तपस्या जैसा है। इसके लिए वे बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करती हैं।
- आम की डालियों और उसकी छाल को चुनकर छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है।
- इन टुकड़ों को एक खास प्रक्रिया के जरिए उबाला जाता है ताकि उनका प्राकृतिक अर्क निकल सके।
- यह रंग न केवल लंबे समय तक टिकता है, बल्कि यह इको-फ्रेंडली भी होता है।
ओडीओपी (ODOP) ने दी नई उड़ान
सरकार की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) योजना ने सुशीला जैसे स्थानीय कलाकारों के लिए रास्तों को आसान कर दिया है। आज सुशीला के बनाए उत्पादों को बाजार में एक नई पहचान मिली है और उनकी मेहनत को उचित मूल्य भी मिल रहा है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है यह खबर?
सुशीला देवी की यह पहल आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण है। आज के दौर में जब हर चीज में मिलावट और केमिकल का बोलबाला है, ऐसे में ‘ऑर्गेनिक’ उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
गोरखपुर के कारीगरों के लिए यह मॉडल यह सिखाता है कि कैसे सीमित संसाधनों में भी नई तकनीक अपनाकर अपनी आय बढ़ाई जा सकती है। यह खबर न केवल स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देती है, बल्कि भविष्य की पीढ़ी को अपनी जड़ों और कुदरती रंगों की ओर लौटने की प्रेरणा भी देती है।


