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ईरान की टॉप लीडरशिप खत्म, फिर कैसे जंग लड़ रहा:7 टुकड़ों में ताकत बांट रखी; हर पद के लिए 4 उत्तराधिकारी पहले से तय

ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच 12 दिनों से जंग जारी है। पहले ही दिन सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत के बाद अब तक करीब 50 टॉप अधिकारी हमले में मारे गए हैं। इसके बावजूद ईरान दावा कर रहा है कि वह लंबे समय तक जंग लड़ सकता है।

अल जजीरा के मुताबिक इसके लिए ईरान ने एक खास स्ट्रेटजी बनाई है, जिसमें सेना का कमान किसी के पास नहीं बल्कि 7 छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दी गई है। इसके अलावा हर पद के लिए 4 संभावित उत्तराधिकारी पहले से तय कर दिए गए हैं।

अमेरिका ने 28 फरवरी को खामेनेई के कॉम्प्लेक्स पर हमला किया था, जिसमें उनकी मौत हो गई थी। इस हमले में खामेनेई की बहू और पोती भी मारी गई थीं।

ईरान ने लंबी जंग लड़ने के लिए खास स्ट्रेटजी बनाई

1 मार्च को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि देश ने दो दशकों तक अमेरिका के युद्धों का अध्ययन किया है। इससे सीख कर ऐसा सुरक्षा ढांचा बनाया गया, जिससे राजधानी पर हमला होने के बाद भी लड़ाई जारी रहे।

इसके लिए ईरान ने एक खास स्ट्रेटजी बनाई, जिसका नाम रखा ‘डिसेंट्रलाइज्ड मोजेक डिफेंस’। मोजेक का मतलब टाइल्स (छोटे-छोटे टुकड़ों) से बना हुआ डाइग्राम होता है। ठीक वैसे ही इस रणनीति में ईरान की पूरी सैन्य कमान और क्षमता को केंद्रीकृत नहीं रखा जाता, बल्कि 7 छोटे-छोटे, स्वतंत्र हिस्सों में बांट दिया जाता है।

इससे अगर दुश्मन टॉप लीडरशिप, सेंट्रल कमांड सेंटर, या बड़े हेडक्वार्टर पर हमला करके उन्हें नष्ट भी कर दे, तब भी बाकी सिस्टम टूटता नहीं है और लड़ाई जारी रख सकता है।

नेटवर्क की तरह काम करती है ईरान की मोजेक डिफेंस सिस्टम

‘डिसेंट्रलाइज्ड मोजेक डिफेंस’ इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से सबसे ज्यादा जुड़ी हुई है। यह पूर्व कमांडर मोहम्मद अली जाफरी (2007-2019) के समय विकसित हुई।

इस ढांचे में IRGC, बसीज मिलिशिया, नियमित सेना, मिसाइल यूनिट, नौसेना और स्थानीय कमांड संरचनाएं एक नेटवर्क की तरह काम करती हैं। संचार टूटने की स्थिति में भी स्थानीय यूनिट्स को कार्रवाई की स्वतंत्रता रहती है।

ईरान ने 7 ग्रुप में सेना को बांटा

ईरान ने अलग-अलग संस्थाओं को अलग-अलग रोल दिए हैं।

  1. रेगुलर आर्मी (आर्टेश): पहले झटके को सहन करती है। आर्मर्ड, मैकेनाइज्ड और इन्फैंट्री यूनिट्स दुश्मन के एडवांस हमलों को स्लो करती हैं। फ्रंट को स्टेबलाइज करती हैं।
  2. एयर डिफेंस यूनिट्स: छिपाव, धोखा और डिस्पर्सल (फैलाव) से दुश्मन की एयर सुपीरियरिटी को जितना हो सके रोकती हैं।
  3. IRGC: मुख्य रोल दूसरे स्टेज में। डिसेंट्रलाइज्ड ऑपरेशंस, घात, लोकल रेसिस्टेंस, सप्लाई लाइन्स डिसरप्ट करना, शहरों, पहाड़ों और रिमोट इलाकों में फ्लेक्सिबल गोरिल्ला वॉर।
  4. बसिज मिलिशिया: इसे 31 प्रांतों में डिवाइड किया गया है, लोकल कमांडरों को ज्यादा ऑटोनॉमी (स्वायत्तता) मिली है।
  5. नौसेना: फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एंटी-एक्सेस टैक्टिक्स, फास्ट अटैक क्राफ्ट, माइंस, एंटी-शिप मिसाइल्स से दुश्मन के जहाजों को तबाह करना।
  6. मिसाइल फोर्स (IRGC कंट्रोल): डिटरेंट और डीप स्ट्राइक – दुश्मन के इंफ्रास्ट्रक्चर और मिलिट्री टारगेट्स पर हमला।
  7. क्षेत्रीय नेटवर्क (प्रॉक्सी फोर्सेस): मिडिल ईस्ट में सहयोगी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती आदि) जंग को ईरान की सीमाओं से बाहर फैलाते हैं, ताकि दुश्मन एक फ्रंट पर फोकस न कर सके।

ईरान ने क्यों अपनाई यह रणनीति?

2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और 2003 में इराक पर हमला किया। इससे सद्दाम हुसैन का हाईली सेंट्रलाइज्ड रिजीम कुछ ही दिनों में ढह गया। कमांड स्ट्रक्चर पर हमला हुआ और सब कुछ बिखर गया। ईरान ने देखा और सीखा कि सेंट्रल कमांड पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

ईरान ने अपनी सेना को और सेंट्रलाइज्ड नहीं बनाया, बल्कि छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा। ईरान जानता है कि दुश्मन की कन्वेंशनल ताकत (एयर पावर, टेक्नोलॉजी, इंटेलिजेंस) ज्यादा होगी, इसलिए उसने सीधे मुकाबले के बजाए सर्वाइवल यानी जंग को लंबी खींचने और दुश्मन को थकाने वाली स्ट्रेटजी अपनाई।

1979 की इस्लामिक रिवॉल्यूशन के बाद मोजाहिदीन -ए-खल्क जैसे ग्रुप्स के अटैक्स और 1980-88 की ईरान-इराक वॉर (8 साल की एट्रिशन जंग) ने भी इसे मजबूत किया।

चीन के प्रोलॉन्ग्ड वॉर थ्योरी से स्ट्रेटजी बनाई

ईरान के हथियार भी इसमें अहम रोल निभाते हैं। ईरान सस्ते हथियार बनाता है, जैसे शाहेद ड्रोन (कुछ हजार डॉलर में)। दुश्मन को इन्हें रोकने के लिए महंगे इंटरसेप्टर मिसाइल्स इस्तेमाल करने पड़ते हैं। इससे समय के साथ दुश्मन का खर्च बहुत बढ़ जाता है।

जंग जितनी लंबी, उतना आर्थिक और राजनीतिक दबाव। ईरान का फोकस क्विक विक्ट्री नहीं, बल्कि दुश्मन को थकाकर और महंगा पड़ने पर मजबूर करना है।

ईरान की यह सोच चीनी नेता माओ त्से-तुंग की “प्रोलॉन्ग्ड वॉर” यानी लंबे युद्ध की अवधारणा से मिलती-जुलती है। इस सिद्धांत के मुताबिक कमजोर पक्ष को ताकतवर दुश्मन को तुरंत हराने की जरूरत नहीं होती। वह शुरुआती झटका झेलकर युद्ध को लंबा कर सकता है और धीरे-धीरे दुश्मन की इच्छाशक्ति और संसाधनों को कमजोर कर सकता है।

इसे सिद्धांत को ईरान में IRGC के चीफ स्टेटिजिस्ट हसन अब्बासी लेकर आए थे। वहीं, मोहम्मद अली जाफरी ने इन विचारों को सैन्य ढांचे में लागू करने में अहम भूमिका निभाई।

ईरान ने हर पद के लिए चार उत्तराधिकारी तय कर रखे

ईरान ने कई सैन्य और प्रशासनिक पद के लिए पहले से उत्तराधिकारी तय रखे हैं। कई मामलों में चार-चार उत्तराधिकारी रखने की बात कही गई, जिसे “फोर्थ सक्सेसर” की अवधारणा कहा जाता है। इसका मकसद यह है कि अगर किसी नेता की हत्या हो जाए या संपर्क टूट जाए, तब भी व्यवस्था चलती रहे।

  • पहला सक्सेसर मारा जाए तो दूसरा, तीसरा या चौथा तैयार रहे।
  • यह सिर्फ टॉप लीडर (जैसे सुप्रीम लीडर) के लिए नहीं, पूरे सिस्टम में, कमांडर, ऑफिसर आदि के लिए भी लागू होता।
  • एक छोटा इनर सर्कल भी था जो कम्युनिकेशन कटने पर फैसले ले सकता था।
  • एक व्यक्ति या ग्रुप की मौत से सिस्टम पैरालाइज न हो।

ईरानी सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मुजतबा खामेनेई उत्तराधिकारी बने

क्यों महत्वपूर्ण है यह रणनीति

अमेरिका और इजराइल की सैन्य रणनीति अक्सर तेज और सटीक हमलों के जरिए दुश्मन के नेतृत्व और कमांड सिस्टम को खत्म करने पर फोकस्ड रही है।

ईरान की “मोजेक डिफेंस” इसी रणनीति का जवाब मानी जाती है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भारी हमलों और बड़े नुकसान के बाद भी सैन्य और राजनीतिक ढांचा पूरी तरह बर्बाद न हो।

ईरान की इस सोच के मुताबिक युद्ध का फैसला केवल शुरुआती सैन्य ताकत से नहीं होता। समय, सहनशक्ति और संगठन की क्षमता भी उतनी ही अहम भूमिका निभाती है।

अराघची ने हाल ही में कहा था कि ईरान पर बमबारी से जंग की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा है और ईरान तय करेगा कि जंग कब और कैसे खत्म होगी

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