उत्तर प्रदेश की सरजमीं आज एक बार फिर सुर्खियों में है। कहीं अपराध पर लगाम लगाने के लिए पुलिस की बंदूकें गरजी हैं, तो कहीं सिस्टम की लापरवाही ने मरीजों की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया है। 8 जून की दोपहर तक राज्य के कोने-कोने से आई खबरें आम आदमी के जीवन पर सीधा असर डाल रही हैं।
आजमगढ़ में इनामी बदमाश ढेर, पिलखुवा में मचा बवाल
आजमगढ़ में एसटीएफ और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई ने एक लाख के इनामी बदमाश को मार गिराया है। यह अपराधी दुधिया पृथ्वीराज यादव हत्याकांड का मुख्य आरोपी था और उस पर आधा दर्जन जिलों में तीन दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज थे। वहीं, दूसरी ओर हापुड़ के पिलखुवा में 11 दिनों से लापता एक नाबालिग लड़की की बरामदगी न होने पर हिंदू संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है। प्रशासन की कार्यशैली पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं और परिजन अपनी बेटी के इंतजार में बेहाल हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और महंगाई की मार
राजधानी लखनऊ के केजीएमयू (KGMU) से आई खबर ने सबको हैरान कर दिया है, जहां पांच लाख रुपये की जीवनरक्षक दवाएं बर्बाद हो गईं। एक तरफ मरीज दवा के लिए मोहताज हैं, वहीं सिस्टम की अनदेखी से सरकारी संपत्ति नष्ट हो रही है। इस बीच, हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की जेब पर भी महंगाई की मार पड़ी है। एटीएफ के दाम और पीक सीजन के कारण वाराणसी से मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद की उड़ानों का किराया तीन गुना तक उछल गया है।
पीलीभीत का दर्दनाक हादसा और हाईकोर्ट के निर्देश
पीलीभीत के जहानाबाद में हुए हादसे ने इलाके को झकझोर कर रख दिया है। हाईटेंशन लाइन की चपेट में आई एक बस में करंट फैलने से पिता-पुत्र की जान चली गई। वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमरोहा हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट को सख्त निर्देश दिए हैं कि डीएनए रिपोर्ट आने के बाद ही मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाया जाए। साथ ही, हाईकोर्ट परिसर में पार्किंग और चैंबर आवंटन के नियमों को भी चुनौती दी गई है।
मायने और प्रभाव
इन खबरों का सीधा मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश का प्रशासनिक ढांचा इस वक्त चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर पुलिस का ‘एनकाउंटर’ खौफ पैदा कर रहा है, तो दूसरी ओर स्वास्थ्य और परिवहन जैसे बुनियादी क्षेत्रों में जवाबदेही की भारी कमी दिख रही है। आम जनता के लिए ये खबरें केवल सूचना नहीं, बल्कि उनके सुरक्षा और सुविधाओं के स्तर का आईना हैं। जब तक सरकारी संस्थानों में दवाओं की बर्बादी और पुलिस थानों में लंबित मामलों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम नागरिक का भरोसा जीतना मुश्किल बना रहेगा।




