महोबा में प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
उत्तर प्रदेश के महोबा से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसे देखकर हर किसी की रूह कांप जाए। छिकहरा गांव के निवासियों ने एक मृत महिला के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट न मिलने पर सड़क पर ही चिता सजा दी। यह कोई महज प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस नाकामी के खिलाफ एक चीख थी, जो वर्षों से अनसुनी की जा रही थी।
सड़क पर घंटों थम गई जिंदगी की रफ्तार
बृहस्पतिवार की दोपहर, छिकहरा गांव में तब हड़कंप मच गया जब ग्रामीणों ने शव को मुख्य सड़क पर रखकर अंतिम संस्कार करने की जिद ठान ली। देखते ही देखते सड़क पर गाड़ियों की लंबी कतार लग गई और तीन घंटे तक यातायात पूरी तरह ठप रहा। स्कूली बच्चे और राहगीर गर्मी और बदइंतजामी के बीच फंसे रहे, लेकिन ग्रामीणों का दर्द इतना गहरा था कि वे पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
क्या है असल समस्या?
- जमीन का अभाव: गांव में श्मशान घाट के लिए कोई चिन्हित जमीन नहीं है।
- बरसात की मार: जो वैकल्पिक स्थान ग्रामीण इस्तेमाल करते थे, वहां जलभराव के कारण शव का अंतिम संस्कार करना नामुमकिन हो गया था।
- प्रशासन की अनदेखी: ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन अधिकारियों ने हर बार सिर्फ आश्वासन देकर टाल दिया।
मायने और प्रभाव
महोबा की यह घटना सिर्फ एक गांव का विरोध नहीं है, बल्कि यह देश के कई ग्रामीण इलाकों की कड़वी सच्चाई है। जब सरकारी कागजों में योजनाएं दम तोड़ती हैं और बुनियादी सुविधाएं—जैसे एक श्मशान घाट—तक नसीब नहीं होती, तब जनता सड़क पर उतरने को मजबूर होती है। यह घटना प्रशासन को आईना दिखाती है कि अगर संवेदनशील मुद्दों पर समय रहते काम नहीं हुआ, तो सामाजिक असंतोष का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। फिलहाल, अधिकारियों के लिखित आश्वासन के बाद मामला शांत हुआ है, लेकिन सवाल यह है कि कब तक आम जनता को अपने अधिकारों के लिए सड़क पर चिता सजानी पड़ेगी?

