उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील (पीएम पोषण योजना) को लेकर योगी सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया है। अब स्कूलों में मिड-डे मील के वित्तीय और प्रबंधन की कमान ग्राम प्रधानों के हाथों से छिनकर सीधे विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) के पास पहुंच गई है।
नई व्यवस्था: अब स्कूल की ‘तिजोरी’ की चाबी किसके पास?
शिक्षा विभाग के ताजा आदेशों के मुताबिक, अब तक जो बैंक खाते ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक (हेडमास्टर) के संयुक्त हस्ताक्षर से संचालित होते थे, उनमें बदलाव किया गया है। अब मिड-डे मील का संचालन विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) के अध्यक्ष और प्रधानाध्यापक मिलकर करेंगे।
बदलाव के मुख्य बिंदु:
- सीधा नियंत्रण: अब रसोइयों का मानदेय और भोजन पकाने की सामग्री का भुगतान SMC अध्यक्ष की मंजूरी के बिना नहीं हो सकेगा।
- अभिभावकों की भागीदारी: चूँकि SMC अध्यक्ष स्कूल में पढ़ने वाले किसी बच्चे के अभिभावक होते हैं, सरकार का मानना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
- डिजिटल प्रक्रिया: लेनदेन और भुगतान की प्रक्रिया को स्कूल स्तर पर ही अधिक चुस्त और जवाबदेह बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार का तर्क: क्यों लिया गया यह फैसला?
बेसिक शिक्षा विभाग का मानना है कि स्कूल स्तर पर वित्तीय अधिकार देने से भोजन की गुणवत्ता में सुधार होगा। अक्सर ग्राम प्रधानों की व्यस्तता के कारण मिड-डे मील के भुगतान में देरी होती थी, जिससे रसोइयों को समय पर मानदेय नहीं मिलता था। इस नई व्यवस्था से स्कूलों को सीधे तौर पर अपने संसाधनों का प्रबंधन करने में मदद मिलेगी।
ग्राम प्रधानों में नाराजगी: क्या हैं इसके सियासी मायने?
शासन के इस फैसले के बाद प्रदेशभर के ग्राम प्रधानों में हलचल तेज है। प्रधान संगठनों का कहना है कि यह निर्णय पंचायतों के अधिकारों में कटौती जैसा है। उनका तर्क है कि स्कूल परिसर की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए पंचायतें ही जिम्मेदार होती हैं, ऐसे में उन्हें इस योजना से अलग करने से समन्वय में कमी आ सकती है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या है यह बदलाव?
इस बदलाव का सीधा असर गांव की शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के पोषण पर पड़ेगा। अब तक शिकायतें आती थीं कि मिड-डे मील के फंड के लिए प्रधानों के पास चक्कर लगाने पड़ते थे। SMC अध्यक्ष के हाथ में बागडोर आने से निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी। अभिभावकों को अब अपने बच्चे के स्कूल की गतिविधियों पर नजर रखने का एक मजबूत माध्यम मिल गया है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या स्कूलों के पास इतना प्रशासनिक कौशल है कि वे बिना पंचायत की मदद के लंबे समय तक इस जिम्मेदारी को निर्बाध रूप से निभा पाएंगे।
