क्या IIT की चकाचौंध के पीछे छिपा है जाति का अंधेरा?
देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों यानी IIT को अक्सर सफलता की सीढ़ी माना जाता है। लेकिन, हाल ही में सामने आए आरक्षित वर्ग के छात्रों के अनुभव इस दावे पर बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं। कई पूर्व छात्रों ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया है कि कैसे कैंपस की चकाचौंध के पीछे जातिगत भेदभाव एक कड़वी हकीकत बनकर मौजूद है।
कैंपस का सच: सिर्फ पढ़ाई नहीं, पहचान का संघर्ष
IIT बॉम्बे और अन्य बड़े संस्थानों से पढ़ाई कर चुके आरक्षित वर्ग के छात्रों का कहना है कि भेदभाव सीधे तौर पर नहीं, बल्कि सूक्ष्म तरीके से किया जाता है। छात्रों के अनुसार, क्लासरूम से लेकर हॉस्टल की कैंटीन तक, उनकी ‘योग्यता’ पर हमेशा सवाल उठाए जाते हैं।
- योग्यता पर प्रहार: आरक्षित वर्ग के छात्रों को अक्सर ‘कोटा’ का ताना सुनकर अपना आत्मविश्वास खोना पड़ता है।
- प्रोफेसरों का रवैया: फैकल्टी में SC, ST और OBC प्रतिनिधित्व का बेहद कम होना भी एक बड़ी समस्या है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, IIT बॉम्बे की फैकल्टी में आरक्षित वर्ग के शिक्षक मात्र 11% हैं।
- मानसिक दबाव: भेदभाव के कारण छात्रों को अकेलेपन और गहरे अवसाद (डिप्रेशन) का सामना करना पड़ता है, जो उनकी पढ़ाई पर बुरा असर डालता है।
80 के दशक से आज तक: क्या कुछ बदला?
पूर्व छात्रों का कहना है कि 80 के दशक में जो भेदभाव शुरू हुआ था, वह आज अलग रूपों में जीवित है। भले ही टेक्नोलॉजी बदल गई हो, लेकिन संस्थान के भीतर का ‘जातिगत चश्मा’ पूरी तरह नहीं उतरा है। छात्रों की मानें तो उन्हें मदद मांगने में भी हिचकिचाहट होती है क्योंकि सिस्टम इसे गंभीरता से नहीं लेता।
मायने और प्रभाव: आम छात्रों के लिए क्यों जरूरी है यह बहस?
यह मामला केवल चंद छात्रों की शिकायत नहीं, बल्कि देश के उच्च शिक्षा तंत्र की एक बड़ी कमजोरी को दर्शाता है। अगर भारत के सबसे प्रीमियम संस्थानों में ही जातिगत भेदभाव व्याप्त है, तो आम विश्वविद्यालयों का क्या हाल होगा? यह विषय इसलिए अहम है क्योंकि:
1. समान अवसर का सवाल: जब तक कैंपस में सभी छात्रों को समान सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक आरक्षण का असली उद्देश्य अधूरा रहेगा।
2. प्रतिनिधित्व की कमी: फैकल्टी में विविधता की कमी छात्रों को रोल मॉडल से वंचित रखती है।
3. भविष्य का निर्माण: इन संस्थानों से निकलने वाले छात्र ही कल के लीडर बनते हैं। यदि उनके मन में जातिगत पूर्वाग्रह रह जाते हैं, तो समाज में सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
शिक्षा के मंदिर में जाति का जहर किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। वक्त आ गया है कि शिक्षा मंत्रालय और संस्थानों का प्रशासन इस पर पारदर्शी जांच करे और कैंपस में एक समावेशी माहौल सुनिश्चित करे।





