सदियों पुरानी एक अनसुनी परंपरा
करवा चौथ का त्योहार आते ही पूरे देश में सुहागिनों के बीच एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। हर पत्नी अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में एक ऐसी जगह है जहाँ करवा चौथ के दिन खुशियों की जगह खामोशी पसरी रहती है।
मथुरा की मांट तहसील के सुरीर कस्बे में स्थित बघा मोहल्ला दशकों से एक अजीब परंपरा का पालन कर रहा है। यहाँ की सुहागिनें न तो व्रत रखती हैं और न ही घरों में कोई उत्सव मनाया जाता है। इसके पीछे की वजह कोई आधुनिक सोच नहीं, बल्कि सदियों पुराना एक ‘श्राप’ है।
क्या है बघा मोहल्ले के पीछे की कहानी?
बुजुर्गों की मानें तो इस गांव में कभी एक सती महिला रहती थी। कहानी के अनुसार, जब उनके पति का निधन हुआ, तो वे उनके साथ सती होने जा रही थीं। इस दौरान गांव के कुछ लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, जिससे दुखी होकर उन्होंने गांव को श्राप दे दिया।

स्थानीय लोगों का मानना है कि उस सती के श्राप के कारण यदि इस मोहल्ले की कोई भी विवाहित महिला करवा चौथ का व्रत रखती है, तो वह अनिष्ट को बुलावा देने जैसा है। यही कारण है कि आज भी गांव की महिलाएं इस परंपरा को निभाने का साहस नहीं करतीं।
पीढ़ियों से चला आ रहा डर
- परंपरा का पालन: गांव की नई पीढ़ी भी बुजुर्गों की इस बात का सम्मान करती है।
- सुरक्षा का भाव: अनहोनी के डर से कोई भी महिला जोखिम लेने को तैयार नहीं होती।
- सामाजिक मान्यता: दशकों से इस मोहल्ले में करवा चौथ का कोई भी आयोजन नहीं देखा गया है।
मायने और प्रभाव: लोक परंपरा या अंधविश्वास?
यह मामला महज एक किस्सा नहीं है, बल्कि भारत के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त उस लोक संस्कृति को दर्शाता है जहाँ आज भी ‘श्राप’ और ‘मान्यताओं’ का गहरा प्रभाव है। तर्क और विज्ञान के इस दौर में भी, बघा मोहल्ले के लोग अपनी जड़ों और पूर्वजों की चेतावनियों को अटूट विश्वास के साथ सहेज रहे हैं।
यह स्थिति बताती है कि हमारे समाज में आस्था और डर किस कदर एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। चाहे इसे आप रूढ़िवादिता कहें या फिर पीढ़ियों का विश्वास, मथुरा का यह गांव अपनी इस अनोखी और डरावनी पहचान के साथ आज भी चर्चा में बना हुआ है।

