गोरखपुर की चिल्लूपार विधानसभा सीट का सियासी इतिहास हमेशा से बेहद दिलचस्प रहा है। एक समय था जब इस सीट पर बाहुबली हरिशंकर तिवारी का एकछत्र राज हुआ करता था। अब इसी गढ़ में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने अस्मिता चंद को अपना प्रत्याशी बनाकर चुनावी माहौल को पूरी तरह गरमा दिया है।
कौन हैं अस्मिता चंद?
अस्मिता चंद का नाम गोरखपुर की राजनीति में कोई अनजान नहीं है। वे एक कद्दावर राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं। लेकिन उनकी राजनीति की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने हमेशा अपने परिवार की विचारधारा से इतर अपनी अलग राह चुनी है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि 2007 के विधानसभा चुनावों में अस्मिता चंद अपने ही ससुर के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोक चुकी हैं। उनका यह कदम उस समय चर्चा का विषय बना था और इसने साबित किया था कि वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए किसी भी बड़े समीकरण को चुनौती दे सकती हैं।
बीजेपी से मोहभंग और बीएसपी की एंट्री
लंबे समय से ऐसी खबरें थीं कि अस्मिता चंद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में अपनी दावेदारी पक्की करना चाहती थीं। वे काफी समय से टिकट पाने की उम्मीद में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ तालमेल बिठाने में जुटी थीं।
हालांकि, जब बीजेपी से उम्मीद के मुताबिक संकेत नहीं मिले, तो उन्होंने बिना देर किए पाला बदल लिया। बीएसपी में शामिल होते ही उन्हें चिल्लूपार जैसी महत्वपूर्ण सीट से टिकट मिलना यह दर्शाता है कि मायावती की पार्टी उन्हें एक मजबूत चेहरे के रूप में देख रही है।
मायने और प्रभाव
- वर्चस्व की लड़ाई: हरिशंकर तिवारी के गढ़ में सेंधमारी करना किसी भी दल के लिए बड़ी चुनौती होती है। अस्मिता चंद की उम्मीदवारी से यहाँ मुकाबला त्रिकोणीय या उससे भी अधिक जटिल होने की संभावना है।
- पारिवारिक और राजनीतिक समीकरण: ससुर के खिलाफ चुनाव लड़ चुकीं अस्मिता का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वे भावनात्मक रिश्तों से ऊपर उठकर राजनीतिक दांव-पेंच खेलना जानती हैं।
- बीएसपी की रणनीति: बीएसपी का यह फैसला उन मतदाताओं को लुभाने के लिए है जो पारंपरिक राजनीति से हटकर एक नए और आक्रामक नेतृत्व की तलाश में हैं।
चिल्लूपार की जनता के लिए यह चुनाव एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ पुराने दिग्गज और नई राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के बीच सीधी टक्कर है। देखना यह होगा कि क्या अस्मिता चंद का यह ‘रिबेल’ अंदाज उन्हें जीत दिला पाएगा या नहीं।


