गोरखपुर की तंग गलियों में रहने वाली सुशीला ने यह साबित कर दिया है कि अगर हुनर हाथों में हो, तो घर की चारदीवारी भी एक छोटी फैक्ट्री बन सकती है। चिकनी मिट्टी को अपनी मेहनत से जीवंत रूप देने वाली सुशीला आज न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार के लिए एक मजबूत सहारा बनी हुई हैं।
हुनर से बदली तकदीर
सुशीला के दिन की शुरुआत और अंत मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ होता है। एक दिन में करीब 50 टेराकोटा मूर्तियां तैयार करने का उनका कौशल किसी बड़े कलाकार से कम नहीं है। सुशीला बताती हैं कि इस कला में धैर्य की सबसे बड़ी भूमिका है।
कैसे तैयार होती हैं मूर्तियां?
मूर्तिकला की प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए सुशीला कहती हैं, ‘मिट्टी को पहले पानी में घंटों तक भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद मशीन की मदद से उसे अच्छी तरह फेंटा जाता है, ताकि मिट्टी पूरी तरह चिकनी हो जाए और मूर्तियां मजबूत बनें।’
- मजबूती और फिनिशिंग: टेराकोटा की मूर्तियों में बेहतरीन फिनिशिंग और लंबे समय तक चलने वाली मजबूती होती है, जो ग्राहकों की पहली पसंद बनी हुई है।
- परिवार का साथ: सुशीला के काम में उनका पूरा परिवार हाथ बंटाता है, जिससे उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ते हैं।
मायने और प्रभाव
सुशीला की यह सफलता सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश के कुटीर उद्योगों की ताकत को दर्शाती है। महीने के 50 हजार रुपये तक की कमाई यह साबित करती है कि पारंपरिक कला में आज भी बाजार की बड़ी मांग छिपी है। यह कहानी उन गृहिणियों के लिए प्रेरणा है जो घर बैठे ही अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहती हैं। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने के साथ-साथ पारंपरिक शिल्पकला को नई पीढ़ी से जोड़ने का एक बेहतरीन उदाहरण है।


