हाथरस की कांशीराम कॉलोनी आज विकास की नहीं, बल्कि बदहाली की इबारत लिख रही है। कभी सपनों का घर मानी जाने वाली यह टाउनशिप आज हजारों लोगों के लिए ‘मौत का जाल’ बन चुकी है। छतें गिर रही हैं, दीवारें दरक रही हैं, लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने 6000 से अधिक लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है।
जर्जर इमारतों में मौत का डर
कॉलोनी के ब्लॉक नंबर 51 की तीसरी मंजिल का नजारा किसी डरावनी फिल्म जैसा है। यहाँ की दीवारों के बीच से पीपल का एक बड़ा पेड़ उग आया है। इसकी जड़ें न केवल इमारत की नींव को खोखला कर रही हैं, बल्कि जल निकासी पाइपों के जरिए पूरे ढांचे को कमजोर बना रही हैं।
पिलर से सरिये बाहर निकल आए हैं और प्लास्टर हर पल किसी न किसी के सिर पर गिरने का इंतजार कर रहा है। रहवासी बताते हैं कि जरा सी बारिश होते ही उन्हें घर के भीतर भी डर के साये में रातें काटनी पड़ती हैं।

विकास से कोसों दूर, गंदगी का अंबार
सिर्फ इमारतों की जर्जर स्थिति ही नहीं, बल्कि यहां की स्वच्छता व्यवस्था भी पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। कॉलोनी के पिछले हिस्सों में भारी जलभराव, कीचड़ और जहरीली झाड़ियों का साम्राज्य है।
- जलभराव से पनप रही बीमारियां और मच्छरों का प्रकोप।
- टूटे पाइपलाइनों के कारण दूषित पानी की आपूर्ति।
- सफाई व्यवस्था का नामो-निशान न होना।
यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि सरकार ने छत तो दे दी, लेकिन उस छत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पूरी तरह भूल गई है। शिकायतें कई बार की गई हैं, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है?
यह केवल एक कॉलोनी का मुद्दा नहीं है, बल्कि सरकारी आवास योजनाओं के क्रियान्वयन और रखरखाव (maintenance) की बड़ी विफलता है। 6000 लोगों का जीवन दांव पर लगा है, जो किसी भी दिन एक बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
स्थानीय प्रशासन का कर्तव्य केवल चाबियां सौंपना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि आवंटित मकान सुरक्षित हों। अगर जल्द ही इन इमारतों की मरम्मत नहीं की गई, तो हाथरस में एक बड़ा प्रशासनिक और मानवीय संकट खड़ा हो सकता है। जनता को जागरूक होकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर मरम्मत के लिए दबाव बनाना होगा।




