गोरखपुर के सिनेमाई इतिहास का वो दौर जब ‘तरंग टॉकीज’ की चकाचौंध के आगे शहर ठहर जाया करता था, आज महज यादों के गलियारों में सिमट कर रह गया है। एक समय था जब नई फिल्म रिलीज होने पर गोलघर और आसपास के इलाकों से लोग खिंचे चले आते थे, और टिकट खिड़की पर घंटों की जद्दोजहद के बाद मिली एक पर्ची किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं होती थी।
फिल्मों का वो सुनहरा दौर
तरंग टॉकीज सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि गोरखपुर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा था। अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले अवतार से लेकर रोमांटिक फिल्मों के गानों तक, इस टॉकीज ने कई पीढ़ियों को सपनों की दुनिया दिखाई है। लोग परिवार के साथ आते, समोसे-कोल्ड ड्रिंक्स का आनंद लेते और फिल्म खत्म होने के बाद घंटों उसी पर चर्चा करते थे।
क्यों थमी तरंग की रफ्तार?
वक्त बदला और मनोरंजन के साधनों में बदलाव आया। मल्टीप्लेक्स संस्कृति के बढ़ते प्रभाव और ओटीटी (OTT) प्लेटफार्मों के आने के बाद सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का अस्तित्व संकट में पड़ गया। तरंग टॉकीज के बंद होने की कहानी केवल एक हॉल के बंद होने की नहीं, बल्कि एक पूरे दौर के खत्म होने का प्रतीक है।
मायने और प्रभाव
आज भले ही यह इमारत खामोश खड़ी हो, लेकिन इसके बंद होने का असर आसपास के छोटे दुकानदारों और चाय की उन गुमटियों पर भी पड़ा है जो इस टॉकीज की रौनक पर आश्रित थीं।
- बदलता परिवेश: सिनेमा देखने का अनुभव अब पब्लिक स्पेस से निकलकर मोबाइल स्क्रीन तक सिमट गया है।
- आर्थिक असर: सिंगल स्क्रीन बंद होने से स्थानीय व्यापारिक गलियारों की चहल-पहल पर सीधा असर पड़ा है।
- सांस्कृतिक विरासत: क्या हम अपने शहर की ऐसी धरोहरों को सहेजने में नाकाम रहे हैं? यह सवाल आज भी बहस का विषय है।




