हाथरस से आई एक तस्वीर ने उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी है। जिस श्मशान घाट को अंतिम संस्कार के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक होना चाहिए था, वहां अपनों को विदाई देने आए परिजनों को बारिश में भीगती चिताओं को बचाने के लिए तिरपाल का सहारा लेना पड़ा। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस सिस्टम की लाचारी है जो जीवित तो छोड़िए, मरने के बाद भी इंसान को सम्मानजनक विदाई नहीं दे पा रहा है।
बारिश में भीगती चिता और बेबस परिजन
शुक्रवार को हुई भारी बारिश के दौरान हाथरस के एक श्मशान घाट में अव्यवस्थाओं की हदें पार हो गईं। शवों के अंतिम संस्कार के दौरान जब बारिश तेज हुई, तो चिता की आग बुझने का खतरा पैदा हो गया। मजबूरन परिजनों और ग्रामीणों को आपस में चंदा इकट्ठा करना पड़ा और किसी तरह बाजार से तिरपाल मंगवानी पड़ी।
एक तरफ अपनों को खोने का गहरा दुख था, तो दूसरी तरफ बहते पानी के बीच लोग हाथों में तिरपाल थामे खड़े रहे। घंटों तक चली इस जद्दोजहद ने वहां मौजूद हर शख्स को झकझोर कर रख दिया।

आखिर कब सुधरेगा सिस्टम?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर निगम और प्रशासन से कई बार श्मशान घाट पर टीन-शेड या पक्के निर्माण की गुहार लगाई गई। लेकिन फाइलों के बोझ तले दबी यह मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी। क्या एक श्मशान घाट में छत का होना बहुत बड़ी मांग है? यह सवाल हाथरस का हर नागरिक पूछ रहा है।
मायने और प्रभाव: यह क्यों जरूरी है?
इस घटना के सामाजिक और प्रशासनिक मायने बेहद गंभीर हैं:
- मानवीय संवेदना का अभाव: श्मशान घाट में शेड का न होना स्थानीय प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
- विकास के दावों की पोल: सरकार के ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘सुविधाजनक सुविधाएं’ देने के दावों पर यह स्थिति सीधे प्रहार करती है।
- आक्रोश का कारण: ऐसी तस्वीरें जनता के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं, जिससे भविष्य में बड़े विरोध प्रदर्शन की आशंका रहती है।
अंतिम संस्कार एक अत्यंत निजी और दुखद पल होता है। यदि राज्य की राजधानी से सटे हाथरस जैसे जिलों में ऐसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, तो यह निश्चित रूप से सुशासन के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान है।


