मशीनों की तेज रफ्तार वाली दुनिया में हाथ से बनी चीजों की अपनी एक अलग रूह होती है। गोरखपुर के हुमायूंपुर चौराहे के पास एक छोटी सी दुकान इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे पारंपरिक कारीगरी आज भी लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए है।
मशीनी चमक के आगे हाथ की नजाकत
हुमायूंपुर की यह दुकान बीते कई वर्षों से अपनी खास पहचान बनाए हुए है। यहां मिलने वाले फॉर्मल जूते और स्टाइलिश चप्पल किसी ब्रांडेड शोरूम की मशीनी फिनिशिंग को टक्कर देते हैं। मुस्तफा, जो सालों से इस हुनर को जी रहे हैं, कहते हैं कि हाथों से बना जूता न सिर्फ टिकाऊ होता है, बल्कि उसमें कारीगर की मेहनत भी शामिल होती है।
टीमवर्क से तैयार होती है हर जोड़ी
मुस्तफा अकेले नहीं हैं, उनके साथ तीन कुशल कारीगरों की एक टीम काम करती है। काम का बंटवारा बेहद व्यवस्थित है:
- कटिंग: चमड़े को सही शेप में काटना।
- सिलाई: मजबूती और खूबसूरती का तालमेल।
- फिनिशिंग: आखिरी चमक जो जूते को शाही लुक देती है।
यह पूरी टीम दिन भर में 4 से 5 जोड़ी जूते तैयार करती है। यहां मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता है, इसीलिए स्थानीय लोग इन्हें मशीनी जूतों के मुकाबले ज्यादा पसंद करते हैं।
मायने और प्रभाव: यह खबर क्यों जरूरी है?
मशीनीकरण के दौर में छोटे कारीगरों का टिके रहना एक संघर्ष की कहानी है। यह खबर दिखाती है कि अगर गुणवत्ता और समर्पण हो, तो स्थानीय स्तर पर भी ‘मेक इन इंडिया’ की भावना को कैसे जीवित रखा जा सकता है। गोरखपुर जैसे शहर में ऐसी दुकानें न केवल रोजगार देती हैं, बल्कि एक कला को भी विलुप्त होने से बचा रही हैं। ग्राहकों के लिए यह बेहतर विकल्प है कि वे ब्रांड के नाम पर महंगे और कम टिकाऊ जूतों के बजाय स्थानीय कारीगरों के हुनर पर भरोसा करें।



