अस्पताल, जिसे हम जीवन बचाने का आखिरी जरिया मानते हैं, कभी-कभी वही जगह किसी के लिए काल बन जाती है। हरदोई से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहाँ एक आठ महीने के मासूम की जान महज इसलिए चली गई क्योंकि अस्पताल के स्टाफ ने उसे उसकी जरूरत से कई गुना ज्यादा ऑक्सीजन दे दी।
क्या है पूरा मामला?
पीड़ित परिवार के मुताबिक, बच्चे को सांस लेने में दिक्कत होने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टर और स्टाफ की निगरानी में इलाज शुरू हुआ, लेकिन कुछ ही देर में स्थिति बिगड़ने लगी। आरोप है कि बच्चे को छह लीटर प्रति मिनट की रफ्तार से ऑक्सीजन दी गई, जो एक आठ महीने के शिशु के लिए बेहद घातक थी।
अधिक ऑक्सीजन का दबाव बच्चे के नन्हे फेफड़े झेल नहीं पाए और कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और अस्पताल परिसर में हड़कंप मच गया है।
परिजनों का आरोप और पुलिस की कार्रवाई
बच्चे के परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अगर सही तरीके से मॉनिटरिंग की जाती, तो आज उनका बच्चा उनके पास होता।
- अस्पताल प्रशासन ने अभी तक मामले पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है।
- पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
- पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
मायने और प्रभाव: सिस्टम की ढिलाई पर बड़ा सवाल
यह घटना केवल एक बच्चे की मौत नहीं है, बल्कि मेडिकल सिस्टम में व्याप्त उस बड़ी लापरवाही को उजागर करती है जहाँ प्रोटोकॉल को ताक पर रखा जा रहा है। ऑक्सीजन की मात्रा तय करने में हुई यह चूक सीधे तौर पर मानवीय भूल या प्रशिक्षण की कमी की ओर इशारा करती है।
स्थानीय स्तर पर अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह एक कड़ा सबक है। क्या हम निजी अस्पतालों के भरोसे पूरी तरह सुरक्षित हैं? ऐसे मामलों में सिर्फ मुआवजे की बात करना काफी नहीं है, बल्कि जिम्मेदार डॉक्टरों और स्टाफ पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि दोबारा किसी मासूम को ऐसी ‘अस्पताली लापरवाही’ का शिकार न होना पड़े।




