क्या आपके बच्चे जिस स्कूल बस या वैन में सवार होकर रोज शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं, वह वाकई सुरक्षित है? उत्तर प्रदेश के अभिभावकों की इस सबसे बड़ी चिंता पर अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी सख्त मुहर लगा दी है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार को दो टूक आदेश दिया है कि स्कूली वाहनों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
सख्त रुख: क्या हैं हाईकोर्ट के निर्देश?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में स्कूली वाहनों की अनियंत्रित स्थिति और बच्चों की सुरक्षा के प्रति बरती जा रही लापरवाही पर संज्ञान लेते हुए मुख्य सचिव को निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि राज्य के हर जिले में ‘विद्यालय परिवहन सुरक्षा समितियों’ का गठन अनिवार्य रूप से किया जाए।
कोर्ट का आदेश है कि मुख्य सचिव एक सप्ताह के भीतर इस संबंध में सभी संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी करें। वहीं, प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे अपने-अपने जिलों में स्कूली वाहनों की सघन जांच करवाएं और इसकी अनुपालन रिपोर्ट एक महीने के भीतर अदालत के सामने पेश करें।
अभिभावकों के लिए राहत की उम्मीद
अक्सर देखा जाता है कि प्राइवेट स्कूल अपनी बसों के फिटनेस, ड्राइवरों के वेरिफिकेशन और परमिट के नियमों को ताक पर रख देते हैं। हाईकोर्ट की इस सख्ती से अब उन स्कूलों पर नकेल कसना तय है जो मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं।
- स्कूल बसों के फिटनेस प्रमाण पत्र की होगी अनिवार्य जांच।
- ड्राइवरों के चरित्र सत्यापन (Police Verification) को प्राथमिकता दी जाएगी।
- ओवरलोडिंग और अनफिट वाहनों पर भारी जुर्माना और जब्ती की कार्रवाई संभव।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है यह खबर?
यह आदेश सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के लिए एक सुरक्षा कवच है जो रोजाना अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय अनहोनी के डर में रहते हैं। जब जिले के डीएम खुद जवाबदेह होंगे, तो शिक्षा माफिया और परिवहन नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूल संचालकों में हड़कंप मचेगा। यह कदम न केवल दुर्घटनाओं को कम करेगा, बल्कि स्कूली परिवहन व्यवस्था में जवाबदेही की संस्कृति को भी बढ़ावा देगा। आने वाले दिनों में सड़क पर दौड़ती स्कूली वैन और बसों की कड़ी जांच देखने को मिल सकती है।





