दिल्ली की चिलचिलाती धूप में लद्दाख की आवाज
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों एक ऐसा आंदोलन चल रहा है जिसने न केवल भारत, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींचा है। प्रसिद्ध शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनके इस संघर्ष का केंद्र लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण है।
मांग क्या है और क्यों है जरूरी?
सोनम वांगचुक की प्रमुख मांगें लद्दाख को छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करने और वहां की नाजुक पारिस्थितिकी (Ecology) को बचाने से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि लद्दाख की संस्कृति और पर्यावरण को औद्योगिक शोषण से बचाने के लिए स्थानीय शासन जरूरी है। केंद्र सरकार के साथ कई दौर की बातचीत बेनतीजा रहने के बाद, उन्होंने अपनी जान की बाजी लगाने का फैसला किया है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
जंतर-मंतर पर वांगचुक के मंच पर राजनीतिक हस्तियों का जमावड़ा लगा है। हाल ही में समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव भी वहां पहुंचीं, जहां उनके भाषण के दौरान एक छोटी सी चूक ने सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी। वहीं, बॉलीवुड और अन्य क्षेत्रों से भी उन्हें लगातार समर्थन मिल रहा है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस आश्वासन न मिलने से समर्थक चिंतित हैं।
मायने और प्रभाव
- पर्यावरण का संकट: हिमालय का ग्लेशियर पिघल रहा है और वांगचुक की चेतावनी को नजरअंदाज करना आने वाली पीढ़ी के लिए महंगा पड़ सकता है।
- लोकतांत्रिक संवाद: किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह एक बड़ा सवाल है कि एक प्रतिष्ठित नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल जैसे कठोर कदम क्यों उठाने पड़ रहे हैं।
- क्षेत्रीय प्रभाव: लद्दाख की सुरक्षा का मुद्दा सिर्फ एक इलाके का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के व्यापक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ा है।
फिलहाल, वांगचुक ने स्पष्ट कहा है कि वे हार मानने वाले नहीं हैं। उनका धैर्य और संकल्प आने वाले दिनों में और भी बड़े आंदोलनों का रूप ले सकता है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ना तय है।




