सियासत की बिसात पर कब कौन सा मोहरा अपनी चाल बदल दे, यह कहना मुश्किल होता है। लखनऊ के सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक खास चर्चा गर्म है—एक ऐसे नेताजी की, जिनके दोनों हाथों में ‘लड्डू’ हैं, और दूसरी तरफ एक ऐसी प्रशासनिक टीम जो न इधर की रही, न उधर की।
दो नावों की सवारी और सियासी लाभ
राजनीति में संतुलन बनाना हर किसी के बस की बात नहीं, लेकिन हमारे ‘नेताजी’ ने इसमें महारत हासिल कर ली है। एक तरफ सरकार में अपनी पैठ बनाए रखना और दूसरी तरफ अपने निजी हितों को साधना, इसे ही कहते हैं ‘दोनों हाथों में लड्डू’।
स्थानीय सूत्रों की मानें तो यह जुगलबंदी केवल एक संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति है। इससे न केवल उनके सियासी कद को मजबूती मिल रही है, बल्कि विरोधी भी यह समझ नहीं पा रहे कि वार कहाँ से किया जाए।
आफत में ‘माननीय’ और अधर में टीम
जहाँ एक तरफ नेताजी मलाई काट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके भरोसेमंद अधिकारियों की टीम ‘अधर’ में लटकी हुई है। प्रशासनिक फेरबदल की तलवार जब लटकती है, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों का होता है जिन्होंने आँख मूंदकर निर्देशों का पालन किया होता है।
अधिकारियों के बीच कानाफूसी है कि आदेश तो ऊपर से आते हैं, लेकिन जब जवाबदेही तय करने का वक्त आता है, तो ‘माननीय’ किनारा कर लेते हैं। नतीजतन, टीम न तो खुलकर काम कर पा रही है और न ही अपनी बात आलाकमान तक पहुँचा पा रही है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या असर?
- प्रशासनिक सुस्ती: जब तक अफसरों के सिर पर तलवार लटकी रहेगी, फाइलों का काम कछुआ चाल से चलेगा।
- जनता का नुकसान: इस सियासी खींचतान में सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ आम नागरिक तक पहुँचने में देरी होती है।
- पारदर्शिता का सवाल: क्या नौकरशाही केवल नेताओं का मोहरा बनकर रह गई है? यह सवाल आज हर जागरूक नागरिक पूछ रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘लड्डू वाली राजनीति’ और प्रशासनिक ‘अधर’ का यह दौर कब खत्म होता है। तब तक के लिए, लखनऊ के गलियारों में चाय की चुस्कियों के साथ इन किस्सों का दौर जारी है।



