यूपी की राजनीति और नौकरशाही के गलियारों में कुछ ऐसी बातें दबी होती हैं जो दीवारों से बाहर आ जाएं, तो बवाल तय है। आज के ‘सुना है क्या’ में हम उन कहानियों को लेकर आए हैं, जो बताती हैं कि कैसे कभी-कभी माननीय अपनी साख खुद ही दांव पर लगा बैठते हैं और कैसे कुर्सी का रंग चढ़ते ही अफसर भी ‘नेतगिरी’ के मिजाज में आ जाते हैं।
जब कुर्सी का नशा सिर चढ़कर बोले
लखनऊ के दफ्तरों में अक्सर यह चर्चा आम रहती है कि फाइल किसके पास है और कौन सा अफसर किस ‘साहब’ के निर्देश पर काम कर रहा है। किस्सा कुछ ऐसा है कि एक आला अफसर को अचानक नेता जैसी ‘फील’ आने लगी। अपनी गाड़ी के काफिले से लेकर बैठने के अंदाज तक में वो दबदबा दिखने लगा, जो पहले सिर्फ सफेद कुर्ता-पायजामा पहनने वालों की पहचान हुआ करता था।
फाइलें और ‘साहब’ की दौड़
दफ्तरों में अब एक नया ट्रेंड सा बन गया है। नीचे के कर्मचारियों में यह कानाफूसी चलती है कि ‘साहब’ आज फाइल लेकर कहां जाने वाले हैं। कई बार तो दफ्तर के काम से ज्यादा ध्यान इस बात पर होता है कि कौन सी फाइल किस बड़े नेता के दरवाजे पर दस्तक देगी। यह प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए एक बड़ा सवालिया निशान है जो अक्सर गलियारों में चर्चा का विषय बनता है।
फजीहत का नया अध्याय
हाल ही में एक माननीय का जो वाकया सामने आया, उसने सुर्खियां बटोर लीं। जनता की सेवा का दावा करने वाले एक जनप्रतिनिधि ने कैमरे के सामने ऐसी जिद पकड़ ली कि अंत में उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा। उनकी इस फजीहत ने साफ कर दिया कि बिना होमवर्क के मैदान में उतरना कितना महंगा पड़ सकता है।
मायने और प्रभाव
इन किस्सों का मतलब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रशासन के गिरते स्तर का आईना है। जब अफसर खुद को नेता समझने लगे और नेता अपनी गरिमा भूलकर फजीहत कराने पर उतर आएं, तो नुकसान आम जनता का ही होता है। फाइलों का इधर-उधर भटकना और प्रशासनिक कामकाज में देरी इसी मानसिकता का नतीजा है। सुधार तब तक मुमकिन नहीं, जब तक कुर्सी की जिम्मेदारी और सेवा का भाव फिर से अपनी जगह न ले ले।




