कानपुर में खाकी की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला एक बहू के साथ हुई ज्यादती का था, लेकिन जब मामला पुलिस की फाइलों में दर्ज हुआ, तो पीड़ित के नाम पर ससुर का नाम चढ़ा दिया गया। यह हैरान करने वाली चूक तब सामने आई जब शिकायतकर्ता ने एफआईआर की कॉपी देखी और उसके होश उड़ गए।
क्या है पूरा मामला?
पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस ने जल्दबाजी और लापरवाही में दस्तावेजों के साथ खिलवाड़ किया। बहू के साथ हुई घटना की रिपोर्ट लिखवाने के लिए जब ससुर थाने पहुंचे, तो पुलिस ने तकनीकी गड़बड़ी का बहाना बनाकर ससुर को ही मुख्य पीड़ित के तौर पर दर्ज कर लिया। थाने की इस ‘मेहरबानी’ ने न केवल न्याय की प्रक्रिया को बाधित किया, बल्कि पूरे परिवार को सदमे में डाल दिया है।
अधिकारियों की बढ़ीं मुश्किलें
सोशल मीडिया पर यह मामला उछलने के बाद स्थानीय पुलिस प्रशासन में खलबली मच गई है। आनन-फानन में आला अधिकारियों ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, संबंधित थाने के एसएचओ और जांच अधिकारी को जवाबदेही के दायरे में लिया गया है। फिलहाल, पुलिस अब अपनी गलतियों पर लीपापोती करने में जुटी है।
मायने और प्रभाव
इस पूरी घटना ने पुलिसिया कार्यप्रणाली पर गहरा तंज कसा है। आम जनता के मन में यह डर पैदा हो गया है कि यदि थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने में ऐसी लापरवाही होगी, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
- न्याय प्रणाली पर असर: ऐसी गलतियां अपराधियों के लिए एक ढाल का काम करती हैं।
- पारदर्शिता की कमी: पुलिस की कार्यशैली में जवाबदेही तय करना अब अनिवार्य हो गया है।
- जनता का विश्वास: जब तक निचले स्तर पर संवेदनशीलता नहीं आएगी, तब तक पुलिस की ‘मित्र पुलिस’ वाली छवि केवल कागजों तक सीमित रहेगी।




