राजधानी लखनऊ और औद्योगिक नगरी कानपुर के बीच की दूरी कम करने के लिए तैयार हुआ लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे फिलहाल बड़े वाहनों के लिए एक ‘नो-गो ज़ोन’ बना हुआ है। भारी वाहनों की आवाजाही पर लगी रोक जारी है, जिसके चलते न केवल यातायात का दबाव बढ़ रहा है, बल्कि सरकारी खजाने को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
क्यों बंद है भारी वाहनों की एंट्री?
एक्सप्रेसवे के निर्माण और इसकी सुरक्षा मानकों को लेकर फिलहाल आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञ गहन जांच कर रहे हैं। तकनीकी टीम यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि सड़क का ढांचा भारी भरकम ट्रकों और ट्रेलरों का भार सहने में कितना सक्षम है। जब तक आईआईटी की अंतिम रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक प्रशासन कोई भी जोखिम लेने के मूड में नहीं है।
सरकारी खजाने को लगा 18 करोड़ का चूना
इस रोक का सीधा असर टोल राजस्व पर पड़ा है। आंकड़ों की मानें तो भारी वाहनों के प्रवेश न करने से अब तक करीब 18 करोड़ रुपये के टोल का नुकसान हो चुका है। चूंकि व्यावसायिक वाहनों का बड़ा हिस्सा अभी भी पुराने हाईवे से गुजरने को मजबूर है, इसलिए एक्सप्रेसवे की आय पर भारी असर पड़ा है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या है स्थिति?
- सुरक्षा सर्वोपरि: प्रशासन का मानना है कि किसी भी बड़ी दुर्घटना से बचने के लिए एहतियात जरूरी है। सड़क की मजबूती पर कोई भी समझौता यात्रियों की जान से खिलवाड़ हो सकता है।
- पुराने हाईवे पर दबाव: भारी वाहनों के एक्सप्रेसवे पर न जाने से लखनऊ-कानपुर के पुराने हाईवे पर ट्रैफिक का दबाव कम नहीं हो पा रहा है। इससे आम यात्रियों को रोजाना जाम और देरी का सामना करना पड़ रहा है।
- आर्थिक सुधार की उम्मीद: एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि जल्द ही तकनीकी क्लीयरेंस मिल जाती है, तो न केवल सरकार का राजस्व बढ़ेगा बल्कि कानपुर और लखनऊ के बीच लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई भी सुगम हो जाएगी।
फिलहाल, यात्रियों और वाहन चालकों को आईआईटी की रिपोर्ट का इंतजार करना होगा। इस बीच, एक्सप्रेसवे पर हल्के वाहनों की आवाजाही जारी रहेगी, लेकिन भारी वाहनों के लिए पुराने रास्तों का ही विकल्प बना रहेगा।




