बरेली की गलियों में गूंजती जरी-जरदोजी की खनक अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुनाई देगी। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन में हुए नए व्यापारिक करारों ने उत्तर प्रदेश के इस ऐतिहासिक शहर के निर्यातकों में एक नई ऊर्जा भर दी है।
वैश्विक बाजार में बरेली की धाक
बरेली का जरी-जरदोजी का काम और लकड़ी का फर्नीचर पहले से ही अपनी कलाकारी के लिए मशहूर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच हुए व्यापारिक समझौतों के बाद, अब इन उत्पादों के लिए रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे नए बाजार खुल गए हैं।
स्थानीय कारोबारियों के अनुसार, जिले का सालाना टर्नओवर पहले ही 1450 करोड़ रुपये के आसपास है। अब इन निर्यात संभावनाओं के साथ, आने वाले समय में यह आंकड़ा कई गुना बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

स्थानीय उद्योगों पर क्या होगा असर?
- जरी-जरदोजी: मध्यम वर्ग के कारीगरों को सीधे बड़े अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स मिलने की राह आसान होगी।
- फर्नीचर उद्योग: बरेली की लकड़ी की नक्काशी अब वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनेगी।
- रोजगार: निर्यात बढ़ने से स्थानीय स्तर पर युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
मायने और प्रभाव
यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बरेली की अर्थव्यवस्था के लिए एक गेम-चेंजर है। जब पारंपरिक कला को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलती है, तो उसका सबसे बड़ा लाभ सीधे कारीगरों की जेब तक पहुंचता है।
ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार सुगम होने से बिचौलियों की भूमिका कम होगी और सीधे एक्सपोर्ट से स्थानीय हस्तशिल्पियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। आने वाले दिनों में यह बरेली को उत्तर प्रदेश के एक बड़े ‘एक्सपोर्ट हब’ के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।



