जब पूरी दुनिया ‘महिला समानता दिवस’ के जश्न में डूबी होती है, तब आगरा के सुंसार गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा होता है। यहां की महिलाओं और बेटियों के लिए समानता का अर्थ केवल एक किताब में सिमटकर रह गया है, क्योंकि हकीकत तो बदहाल रास्तों और अधूरी शिक्षा के बीच दम तोड़ रही है।
शिक्षा का दम घुटता है आठवीं के बाद
सुंसार गांव की बेटियों का बचपन आठवीं कक्षा तक ही सीमित है। स्कूल की दहलीज लांघने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कोई संसाधन मौजूद नहीं है। संसाधन न होने के कारण नन्हीं आंखों में पल रहे बड़े सपने दम तोड़ देते हैं।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि साधन विहीन होने के कारण वे अपनी बेटियों को शहर भेजने में डरते हैं। यह केवल एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि पूरे गांव का सामूहिक संकट है।
सड़क नहीं, तो स्वास्थ्य सुविधाओं का अकाल
शिक्षा के साथ ही स्वास्थ्य व्यवस्था भी इस गांव की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। सुंसार तक पहुंचने वाली सड़क कच्ची और जर्जर है, जो बारिश के मौसम में कीचड़ के दलदल में तब्दील हो जाती है।
- एंबुलेंस का इंतजार: आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकती।
- सुरक्षा का संकट: रात के समय बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं है।
- विकास से दूरी: पक्की सड़क न होने के कारण गांव आधुनिक विकास की दौड़ में मीलों पीछे छूट गया है।
मायने और प्रभाव: क्या बदलेंगे हालात?
सुंसार की यह कड़वी सच्चाई समाज के आईने पर एक गहरा सवाल है। महिला समानता का अर्थ केवल नारों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि बुनियादी ढांचे के विकास पर टिका है।
जब तक गांव में उच्च शिक्षा और पक्की सड़क नहीं पहुंचेगी, तब तक समानता की बात केवल कागजों तक ही सीमित रहेगी। शासन और प्रशासन को अब वादों से निकलकर जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है, ताकि सुंसार की बेटियां भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकें।



