रूस के कज़ान में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तस्वीरें इस वक्त पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। समिट के औपचारिक फोटो सेशन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा, जहां वे एक तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और दूसरी तरफ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच नजर आए।
टेक्नोलॉजी और मिनरल्स पर PM का कड़ा रुख
ब्रिक्स सत्र को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने बिना किसी देश का नाम लिए वैश्विक ताकतों को आईना दिखाया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि आज के दौर में टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) को सप्लाई चेन के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना गलत है। यह रवैया न केवल व्यापारिक अस्थिरता पैदा करता है, बल्कि वैश्विक विश्वास को भी कम करता है।
ब्रिक्स का बढ़ता कद और भारत की भूमिका
पीएम मोदी ने ‘समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद’ को मजबूत करने पर जोर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली डिक्लेरेशन के जरिए भारत ने जिस तरह से अलग-अलग विचारधारा वाले देशों के बीच सहमति बनाई है, उसने ब्रिक्स को एक नई दिशा दी है। वैश्विक मीडिया में भी इस बात की चर्चा है कि कैसे भारत ने ब्रिक्स को किसी खास खेमे (एंटी-वेस्ट) के बजाय ग्लोबल साउथ की आवाज बनाने में सफलता हासिल की है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी?
आखिर यह कूटनीति आपके और हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करती है? इसके बड़े मायने हैं:
- महंगाई पर काबू: वैश्विक स्तर पर मिनरल्स की सप्लाई चेन स्थिर रहने से इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऑटोमोबाइल की कीमतों पर लगाम लगेगी।
- आर्थिक सुरक्षा: भारत की कोशिश है कि वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज बुलंद हो, जिससे भारतीय युवाओं के लिए विदेशों में बेहतर अवसर पैदा होंगे।
- वैश्विक संतुलन: दुनिया के दो सबसे बड़े नेताओं के बीच भारत का केंद्र में होना यह दर्शाता है कि आज का भारत विश्व राजनीति में ‘निर्णायक’ भूमिका में है।
कुल मिलाकर, रूस के कज़ान से आई ये तस्वीरें और पीएम मोदी का यह संबोधन भारत की बदलती साख और विदेश नीति की एक नई परिपक्वता को दर्शाता है।




