क्या पुलिस ने ही रची भरत तिवारी की मौत की साजिश?
बिहार की कानून-व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। भरत तिवारी का कथित एनकाउंटर महज एक पुलिसिया कार्रवाई नहीं, बल्कि राज्य के सियासी गलियारों में एक बड़ा तूफ़ान बन चुका है। ग्रामीण पुलिस की कहानी पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं और सड़कों पर उतरकर न्याय की मांग कर रहे हैं।
आरोप और दावों का खेल
घटना के बाद से ही पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच टकराव की स्थिति है। पप्पू यादव जैसे नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस एनकाउंटर को अंजाम देने के लिए एसटीएफ (STF) का इस्तेमाल किया गया। उनका दावा है कि स्थानीय डीएसपी ने इस कार्रवाई से दूरी बना ली थी, लेकिन ऊपर के दबाव में इसे अंजाम दिया गया।
समर्थन में लामबंद हुआ समाज
इस मुद्दे ने अब एक जन आंदोलन का रूप ले लिया है। रौशन आनंद सर जैसे चर्चित व्यक्तित्व का कहना है कि वर्दी पहनने वाले अब रक्षक के बजाय भक्षक की भूमिका में आ गए हैं। लगभग 5000 लोगों की महापंचायत ने प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया है कि वे इस मामले में निष्पक्ष जांच से कम पर कुछ नहीं मानेंगे।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
प्रशांत किशोर ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को नसीहत दी है। उन्होंने साफ कहा है कि बिहार का शासन संविधान के दायरे में होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति विशेष की सनक के आधार पर। बढ़ते दबाव को देखते हुए डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा है, जिससे पुलिस अब बैकफुट पर नज़र आ रही है।
मायने और प्रभाव
यह मामला महज एक एनकाउंटर का नहीं है, बल्कि आम जनता और पुलिस के बीच भरोसे की खाई को दर्शाता है। यदि पुलिस पर लगे ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह राज्य के कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा। स्थानीय लोगों के लिए यह लड़ाई सिर्फ भरत तिवारी के लिए न्याय की नहीं, बल्कि इस डर से मुक्ति की है कि कहीं कोई निर्दोष सिस्टम का शिकार न हो जाए।




