कानपुर में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सिस्टम की संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दी हैं। अपनों को खोने का गम जिसे झेलना पड़े, वही जानता है कि उस वक्त मन की स्थिति क्या होती है, लेकिन कानपुर में एक दुखी पत्नी के साथ जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए एक बदनुमा दाग है।
पोस्टमार्टम का लंबा इंतजार और ऊपर से ‘वसूली’ का दंश
एक महिला अपने पति का पार्थिव शरीर लेने के लिए कानपुर के सरकारी अस्पताल और मोर्चरी के चक्कर काटती रही। दुख की इस घड़ी में उसे सहारा मिलने की जगह सिस्टम के आगे हाथ फैलाने पड़े। आरोप है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर उसे पांच घंटे तक तपती गर्मी और मानसिक प्रताड़ना के बीच इंतजार कराया गया।
इतना ही नहीं, अंतिम संस्कार के लिए जरूरी औपचारिकताओं के नाम पर की गई अवैध वसूली ने महिला को पूरी तरह तोड़ दिया। उसने रोते हुए कहा, ‘मैंने पति खोया है, लेकिन कानपुर की इस बेरुखी ने मेरे जख्मों को और गहरा कर दिया है। मैं अब इस शहर में कभी वापस नहीं लौटूंगी।’

आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?
- संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: दुखियारी पत्नी से पैसे ऐंठना न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि यह नैतिक रूप से भी पूरी तरह गलत है।
- प्रशासन की चुप्पी: क्या सरकारी तंत्र में अब इंसानियत की कोई कीमत नहीं बची? अस्पताल प्रबंधन को इस पर कड़ा संज्ञान लेने की जरूरत है।
- कानूनी कार्रवाई की मांग: जो लोग इस घिनौनी वसूली में शामिल थे, उनकी पहचान कर सख्त सजा होनी चाहिए ताकि दोबारा कोई ऐसी हरकत न कर सके।
मायने और प्रभाव (Impact & Analysis)
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के साथ हुई नाइंसाफी नहीं है, बल्कि यह हमारे सरकारी संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार का आइना है। जब किसी परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटता है, तो उसे मदद और सहानुभूति की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में ‘वसूली’ की खबरें आम जनता का विश्वास सिस्टम से पूरी तरह उठा देती हैं।
अगर प्रशासन ने दोषियों पर कार्रवाई नहीं की, तो यह शहर की छवि के लिए घातक होगा। एक महिला का यह कहना कि वह दोबारा शहर नहीं आएगी, उन तमाम लोगों की चीख है जो आए दिन सरकारी दफ्तरों में इसी तरह की बदसलूकी और भ्रष्टाचार का शिकार होते हैं। समय आ गया है कि कानपुर प्रशासन अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाए और दोषियों को कानून के शिकंजे में ले।



