दिल्ली की सरजमीं एक बार फिर वैश्विक राजनीति का केंद्र बनने जा रही है। ब्रिक्स (BRICS) देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की अहम बैठक में शामिल होने के लिए चीन, रूस और ईरान जैसे देशों के प्रतिनिधि भारत आ रहे हैं। यह वही मंच है जिसे लेकर वैश्विक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं हैं, खासकर अमेरिका के बदलते रुख के बीच।
कौन-कौन जुट रहा है दिल्ली में?
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के निमंत्रण पर ब्रिक्स देशों के आला अधिकारी दिल्ली पहुंच रहे हैं। इस बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी और रूस समेत अन्य सदस्य देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। यह मुलाक़ात ऐसे समय पर हो रही है जब अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
ट्रंप की चिंताओं और वैश्विक समीकरणों के बीच बैठक
ब्रिक्स को अक्सर पश्चिम देशों, खासकर अमेरिका के दबदबे को चुनौती देने वाले मंच के रूप में देखा जाता है। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल से ही इस मंच को लेकर अमेरिका की आपत्तियां जगजाहिर रही हैं। भारत के लिए यह बैठक कूटनीतिक संतुलन बनाने की एक बड़ी परीक्षा मानी जा रही है।

बैठक के मुख्य एजेंडे
- क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर ठोस चर्चा।
- ब्रिक्स देशों के बीच आपसी विश्वास बहाली के उपाय।
- चीन के साथ सीमा विवाद और कूटनीतिक संवाद की नई राहें।
- वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों की भूमिका।
मायने और प्रभाव: भारत के लिए क्यों जरूरी?
इस बैठक का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत अपनी विदेश नीति में ‘स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी’ यानी रणनीतिक स्वायत्तता पर कायम है। हम अमेरिका के साथ भी मजबूत रिश्ते रखते हैं और ब्रिक्स के जरिए चीन और रूस के साथ संवाद की मेज पर भी बैठते हैं।
आम जनता के लिए इसका सीधा असर व्यापार, सीमा सुरक्षा और वैश्विक निवेश पर पड़ता है। जब बड़े देशों के प्रतिनिधि दिल्ली में चर्चा करते हैं, तो इसका सीधा असर भारत की साख और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारे रुतबे पर पड़ता है। यह बैठक साबित करती है कि वैश्विक समाधानों के लिए भारत की मेज अब अनिवार्य हो चुकी है।


