दिल्ली का जंतर-मंतर, जिसे बरसों तक लोकतंत्र की गूंज सुनने का आदी माना गया, अब हमेशा के लिए खामोश होने की कगार पर है। केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन के नए आदेशों के बाद जंतर-मंतर अब औपचारिक रूप से ‘प्रोटेस्ट साइट’ नहीं रहा। 33 सालों तक सत्ता के गलियारों तक आम आदमी की आवाज पहुंचाने वाला यह स्थल अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया है।
क्यों बदला गया प्रदर्शन का ठिकाना?
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार, अब राजधानी में विरोध प्रदर्शन के लिए नए स्थल चिन्हित किए गए हैं। दशकों से चले आ रहे इस बदलाव को प्रशासन सुरक्षा और व्यवस्था का नाम दे रहा है। सीजेपी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे ‘लोकतंत्र के गला घोंटने’ जैसा करार दिया है। उनका कहना है कि जंतर-मंतर सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की उम्मीद थी, जिन्हें अपनी बात सरकार तक पहुंचानी थी।
अब कहां होंगे आंदोलन?
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में किसी भी तरह के धरना-प्रदर्शन के लिए अब ये तीन जगहें ही अधिकृत होंगी:
- रामलीला मैदान का विशेष क्षेत्र
- बुराड़ी का मैदान
- नरेला क्षेत्र में तय की गई जगह
मायने और प्रभाव: आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। जंतर-मंतर संसद भवन के करीब होने के कारण प्रदर्शनकारियों की आवाज सीधे सत्ता के कानों तक पहुंचती थी। प्रदर्शन स्थलों को शहर के बाहरी इलाकों में शिफ्ट करने से क्या होगा, इसे समझना जरूरी है:
- आवाज की गूंज कम होना: जब प्रदर्शनकारी सत्ता के केंद्र से मीलों दूर होंगे, तो मीडिया और सरकार का ध्यान खींचना कठिन हो जाएगा।
- आंदोलनों का प्रभाव: लोकतंत्र में विरोध करना एक संवैधानिक अधिकार है। यदि प्रदर्शन स्थल मुख्य शहर से दूर होते हैं, तो नागरिक अपनी मांगों को लेकर कम मुखर हो सकते हैं।
- लोकतंत्र की दिशा: क्या देश के हर कोने को ‘जंतर-मंतर’ बनना पड़ेगा? अभिजीत दिपके की यह चेतावनी संकेत है कि अब विरोध के तरीके बदलेंगे, लेकिन विरोध की जरूरत खत्म नहीं होगी।
कुल मिलाकर, जंतर-मंतर का डिनोटिफाई होना सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में विरोध के ‘स्पेस’ को संकुचित करने की एक बड़ी कवायद है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नागरिक समाज इस नई बंदिश को कैसे चुनौती देता है।


