गोरखपुर के नगर निगम दफ्तर में हर मंगलवार को जनसुनवाई का शोर तो होता है, लेकिन क्या वाकई जनता की फरियाद सुनी जाती है? बांसगांव कॉलोनी, बिलंदपुर की रहने वाली ज्योत्सना मिश्रा का अनुभव कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। वह पिछले एक साल से अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं, लेकिन उनकी फाइल फाइलों के ढेर में ही दबी हुई है।
समस्या वही, आश्वासन नए
ज्योत्सना का कहना है कि उनकी कॉलोनी में सड़क और नाली की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। मामूली बारिश में भी यहाँ जलभराव की स्थिति बन जाती है, जिससे स्थानीय लोगों का निकलना दूभर हो जाता है। पिछले एक साल में उन्होंने न जाने कितनी बार निगम के चक्कर काटे हैं।
हर बार उन्हें यह दिलासा दिया जाता है कि काम जल्द शुरू हो जाएगा, लेकिन हकीकत धरातल पर वैसी ही है। एक नागरिक के तौर पर लगातार एक साल तक प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटना सिस्टम की सुस्ती की ओर साफ इशारा करता है।
आम जनता की परेशानी का सबब
सड़क और नाली की यह समस्या केवल ज्योत्सना की नहीं, बल्कि उस पूरी कॉलोनी में रहने वाले दर्जनों परिवारों की है। बदबू और मच्छरों के प्रकोप के बीच रह रहे लोगों के लिए यह स्थिति स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी पैदा कर रही है। नगर निगम की इस लापरवाही का खामियाजा उन टैक्स देने वाले नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है, जो सुविधाओं की उम्मीद में सिस्टम के आगे हाथ फैलाए खड़े हैं।
मायने और प्रभाव
यह मामला महज एक सड़क या नाली का नहीं है, बल्कि नगर निगम की जवाबदेही पर सवालिया निशान है।
- प्रशासनिक सुस्ती: जनसुनवाई जैसे कार्यक्रमों की प्रासंगिकता तब खत्म हो जाती है जब समाधान के बजाय सिर्फ आश्वासन मिले।
- नागरिकों का हताशा: बार-बार चक्कर काटने से सिस्टम के प्रति लोगों का भरोसा टूटता है।
- बुनियादी जरूरतें: गोरखपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में सड़क और जल निकासी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव विकास के दावों की पोल खोलता है।
उम्मीद है कि इस बार जनसुनवाई में उठी यह आवाज संबंधित अधिकारियों तक पहुंचेगी और बिलंदपुर के निवासियों को जल्द ही इस नरक जैसी स्थिति से मुक्ति मिलेगी।






