अमेरिकी सत्ता के गलियारों में बदलाव की आहट के साथ ही वैश्विक व्यापार में हलचल तेज हो गई है। अगर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन वाकई भारतीय उत्पादों पर 100 फ़ीसदी तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाता है, तो इसका सीधा असर आपके और हमारे बाजार पर पड़ना तय है। क्या भारत इस आर्थिक चक्रव्यूह को झेल पाएगा?
टैरिफ का खेल और भारत पर दबाव
डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का मुख्य आधार आयात शुल्क बढ़ाना है। थिंक टैंकों और विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के साथ व्यापारिक मोर्चे पर नरमी बरतने के बाद, अब वाशिंगटन की निगाहें भारत के बढ़ते निर्यात बाजार पर टिकी हो सकती हैं। अगर अमेरिका भारतीय ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल या अन्य जरूरी सामानों पर 100% ड्यूटी लगाता है, तो वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) कम हो जाएगी।
चीन के मुकाबले भारत की चुनौती
चीन के पास विशाल उत्पादन क्षमता और नियंत्रित अर्थव्यवस्था है, जो ऐसे टैरिफ झटकों को झेलने में सक्षम है। भारत के मामले में, हमारे पास विकल्प थोड़े सीमित हैं। रूस से सस्ते तेल की खरीद और पश्चिमी देशों के साथ हमारे व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना अब और भी मुश्किल हो जाएगा। जेपी मॉर्गन के सीईओ जैमी डिमन जैसे दिग्गजों ने भी चेताया है कि वैश्विक स्तर पर तेल और आपूर्ति श्रृंखला में छेड़छाड़ अमेरिका को ही महंगी पड़ सकती है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या होगा असर?
- महंगाई की मार: आयात शुल्क बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल और जरूरी चीजों की कीमतों पर पड़ सकता है।
- निर्यात पर संकट: अगर भारतीय माल अमेरिका नहीं बिका, तो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों पर असर पड़ सकता है।
- रूस-भारत समीकरण: भारत के लिए रूसी तेल एक बड़ी जरूरत है। अमेरिका का दबाव बढ़ा, तो हमें अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) को और मजबूती से पेश करना होगा।
आने वाले दिन व्यापारिक कूटनीति के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हैं। भारत के लिए अब वक्त आ गया है कि वह केवल अमेरिका पर निर्भर न रहकर अपने घरेलू बाजार को मजबूत करे और वैकल्पिक व्यापारिक साझीदारों की तलाश तेज करे।





