कानपुर नगर निगम का सदन शनिवार को अखाड़ा बन गया। शहर के विकास पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक हंगामे और शोर-शराबे की भेंट चढ़ गई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के पार्षद न केवल एक-दूसरे से भिड़े, बल्कि नगर आयुक्त को भी घेरकर तीखे सवाल दागे।
क्यों मचा सदन में बवाल?
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही पार्षदों का गुस्सा फूट पड़ा। पार्षदों का आरोप था कि शहर की बदहाल स्थिति के कारण जनता की नजरों में उनकी छवि ‘चोर’ जैसी बन गई है। पार्षदों ने कहा कि वार्डों में काम नहीं हो रहे हैं और अफसरशाही बेलगाम है।
मुख्य मुद्दे जिन पर हुई तकरार:
- टूटी सड़कें: शहर भर की सड़कों की जर्जर हालत को लेकर पार्षदों ने नाराजगी जताई।
- जलभराव: बारिश के दौरान जलभराव की समस्या पर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे।
- टेंडर घोटाला: ठेकों में अनियमितता और टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर पार्षदों ने गंभीर आरोप लगाए।
नगर आयुक्त के घेराव के दौरान सपा और भाजपा पार्षदों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि सदन की कार्यवाही का संचालन करना मुश्किल हो गया। विपक्षी पार्षदों ने आरोप लगाया कि शहर के बुनियादी विकास के लिए फंड की कमी नहीं है, लेकिन भ्रष्टाचार ने काम रोक रखा है।
मायने और प्रभाव
इस घटना का सीधा असर आम जनता की बुनियादी सुविधाओं पर पड़ता है। जब जनप्रतिनिधि और अधिकारी सदन में लड़ने में व्यस्त रहते हैं, तो विकास कार्यों की फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। कानपुर के निवासियों के लिए यह जरूरी है कि पार्षद केवल शोर न मचाएं, बल्कि ठोस समाधान भी निकालें। अगर नगर निगम के भीतर का यह घमासान नहीं थमा, तो आने वाले समय में शहर के वार्डों में सफाई, सड़क और रोशनी की व्यवस्था और भी बदतर हो सकती है।





