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कुशीनगर का चुनावी रण: ब्राह्मण, सैंथवार और दलित वोट बैंक से तय होती है सत्ता की चाबी

उत्तर प्रदेश की सियासत में पूर्वांचल का अपना एक अलग रसूख है। जब बात पूर्वांचल के उन चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों की हो, जिनकी चर्चा पूरे राज्य में होती है, तो कुशीनगर (संख्या-333) का नाम सबसे ऊपर आता है। भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली के रूप में अंतर्राष्ट्रीय पहचान रखने वाला यह शहर सियासी बिसात पर भी उतना ही संवेदनशील और निर्णायक माना जाता है।

इतिहास और भौगोलिक बदलाव

वर्ष 2008 में जब परिसीमन आयोग ने अपना काम पूरा किया, तब इस सीट को एक नई पहचान मिली। इससे पहले यह इलाका ‘कसया’ (Kasia) विधानसभा के नाम से जाना जाता था। आज यह कुशीनगर संसदीय क्षेत्र का एक प्रमुख हिस्सा है, जिसकी करीब 95% आबादी गांवों में बसती है। केवल 5% आबादी ही कसया कस्बे और कुशीनगर नगर पालिका के दायरे में आती है, जो इस चुनाव को पूरी तरह से ग्रामीण और कृषि प्रधान बनाती है।

जातीय समीकरण: जीत का ‘त्रिकोणीय’ फार्मूला

कुशीनगर में जीत हासिल करने के लिए सियासी दलों को सामाजिक ताने-बाने को साधना पड़ता है। यहां के नतीजों को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख स्तंभ हैं:

  • ब्राह्मण: यह सवर्ण वर्ग यहां का सबसे प्रभावशाली समूह है। इनकी गोलबंदी किसी भी प्रत्याशी की जीत की नींव रखती है।
  • सैंथवार (कुर्मी/OBC): ओबीसी वोट बैंक में सैंथवार समाज का दबदबा है। इनका एकतरफा मतदान अक्सर परिणामों की दिशा बदल देता है।
  • दलित: कुल मतदाताओं में 12-15% हिस्सेदारी के साथ, दलित वर्ग हार-जीत के मार्जिन को तय करने में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाता है।

इसके अलावा यादव, मुस्लिम और वैश्य समुदाय भी अपने-अपने प्रभाव वाले इलाकों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

हालिया चुनावी रुझान: लहर और वर्चस्व

पिछले तीन विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो यहाँ की सियासी तस्वीर साफ हो जाती है:

  • 2022 का चुनाव: भाजपा के पी.एन. पाठक ने 52.14% वोट शेयर के साथ शानदार जीत दर्ज की, जो साबित करता है कि संगठन का आधार यहाँ कितना मजबूत है।
  • 2017 का चुनाव: मोदी लहर के बीच भाजपा के रजनीकांत मणि त्रिपाठी ने करीब 48 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की थी।
  • 2012 का चुनाव: यह दौर समाजवादी पार्टी के लिए ऐतिहासिक रहा, जब ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने सपा की जीत पक्की की और सरकार में मंत्री बने।

मायने और प्रभाव

कुशीनगर के चुनावी मुद्दे अब केवल स्थानीय विकास तक सीमित नहीं रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा और बुद्ध सर्किट के विकास ने इसे विश्व स्तर पर जोड़ दिया है, जिसे भाजपा अपनी मुख्य उपलब्धि बताती है। वहीं, दूसरी ओर गन्ना किसानों का मुद्दा आज भी सबसे बड़ा भावनात्मक और आर्थिक विषय है। गन्ने का उचित मूल्य और समय पर भुगतान ही वह फैक्टर है, जो सत्ताधारी दल की राह आसान या कठिन बना सकता है। कुल मिलाकर, कुशीनगर की जनता अब विकास और जातीय समीकरणों के बीच संतुलन साधकर ही अपना प्रतिनिधि चुनती है।

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