कानपुर और लखनऊ के बीच सफर को आसान बनाने वाला ‘ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे’ खुद आज बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। जिस प्रोजेक्ट से जनता को तेज और सुरक्षित यात्रा की उम्मीद थी, वहां कदम-कदम पर फैली लापरवाही ने अब शासन की नींद उड़ा दी है। सड़क की ऊपरी परत का उखड़ना और मिट्टी का धंसना इस बात का सबूत है कि कहीं न कहीं निर्माण की गुणवत्ता से समझौता किया गया है।
मरम्मत का काम और सवालों के घेरे में निर्माण
एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों पर 100-100 मीटर की सड़क को उखाड़कर दोबारा बनाने की नौबत आ गई है। जगह-जगह चल रहा पैचवर्क यह बताने के लिए काफी है कि काम की क्वालिटी मानकों के अनुरूप नहीं थी। राहगीरों के लिए यह केवल सड़क नहीं, बल्कि एक खतरनाक सफर बन चुका है जहाँ अचानक ब्रेक लगाना या गड्ढों का सामना करना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है।
गृह विभाग सख्त, मांगी स्टेटस रिपोर्ट
लगातार मिल रही शिकायतों के बाद अब यूपी का गृह विभाग हरकत में आया है। शासन ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और वर्तमान स्थिति पर कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों से ‘स्टेटस रिपोर्ट’ तलब की है। सवाल यह है कि आखिर उद्घाटन के इतने कम समय में ही सड़क की यह हालत कैसे हो गई?
प्रमुख बिंदु:
- गुणवत्ता की अनदेखी: सड़क की ऊपरी लेयर और सब-बेस का काम मानकों के मुताबिक नहीं पाया गया।
- सुरक्षा का मुद्दा: मिट्टी धंसने से एक्सप्रेसवे पर चलने वाले वाहनों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है।
- जवाबदेही: प्रशासन अब निर्माण कंपनी और संबंधित इंजीनियरों की भूमिका की जांच कर रहा है।
मायने और प्रभाव
यह एक्सप्रेसवे यूपी की विकास यात्रा की धड़कन माना जाता है। अगर शुरुआती दिनों में ही इसमें दरारें और गड्ढे दिखने लगे हैं, तो यह सरकारी खजाने की बर्बादी के साथ-साथ आम आदमी की सुरक्षा से सीधा खिलवाड़ है। यदि समय रहते जिम्मेदार निर्माण एजेंसियों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह मार्ग एक ‘डेथ ट्रैप’ साबित हो सकता है। जनता अब सिर्फ पैचवर्क नहीं, बल्कि पूरी सड़क की ऑडिट और सख्त जवाबदेही की मांग कर रही है।

