कानपुर में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर एक बार फिर खुलकर सामने आया है। मनरेगा और अन्य सरकारी रोजगार योजनाओं के तहत जिले की 590 ग्राम पंचायतों में 29,500 लोगों को काम देने का बड़ा लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि इस बड़े लक्ष्य का महज 12.59 फीसदी ही पूरा हो पाया है।
शून्य पर सिमटी 195 ग्राम पंचायतें
आंकड़ों की बात करें तो स्थिति चिंताजनक है। जिले की 195 ग्राम पंचायतों में एक भी श्रमिक काम पर नहीं पहुंचा, जिससे वहां रोजगार का आंकड़ा शून्य रहा। कुल 29,500 के निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले अब तक केवल 3,713 श्रमिकों को ही काम मिल सका है। आखिर सरकारी मशीनरी के तमाम प्रयासों के बावजूद श्रमिक काम पर क्यों नहीं पहुंचे? क्या कागजों में चल रही योजनाएं धरातल पर फेल हो रही हैं?
क्यों नहीं मिल रहे श्रमिक?
इस मामले के पीछे कई स्थानीय कारण माने जा रहे हैं:
- मजदूरी का भुगतान: समय पर भुगतान न मिलना श्रमिकों के मोहभंग होने का सबसे बड़ा कारण है।
- काम की कमी: ग्राम स्तर पर सही समय पर योजनाओं का क्रियान्वयन न होना।
- माइग्रेशन: कानपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवा बेहतर मजदूरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या असर?
इस रिपोर्ट के गहरे मायने हैं। जब सरकार रोजगार देने का दावा करती है और लक्ष्य तय करती है, तो उम्मीद यह होती है कि इसका लाभ अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को मिले। लेकिन 195 पंचायतों में शून्य प्रदर्शन का मतलब है कि उन क्षेत्रों में सरकारी विकास की गति पूरी तरह ठप है।
स्थानीय स्तर पर बेरोजगारी झेल रहे युवाओं के लिए यह स्थिति किसी झटके से कम नहीं है। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों ने पंचायतों की मॉनिटरिंग नहीं की, तो सरकारी योजनाओं का लाभ सिर्फ फाइलों तक ही सीमित रह जाएगा। कानपुर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ी चेतावनी है।




