कानपुर के घनी आबादी वाले बंगाली मोहाल इलाके में सोमवार रात एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। बंदरों के एक झुंड की बेतहाशा उछलकूद ने 100 साल पुराने एक जर्जर मकान की नींव हिला दी, जिससे देखते ही देखते इमारत का आधा हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया। गनीमत रही कि घर में मौजूद छह सदस्यों ने समय रहते बाहर भागकर अपनी जान बचा ली।
क्या था पूरा मामला?
बंगाली मोहाल निवासी वेद प्रकाश मिश्रा अपने परिवार के साथ तीन मंजिला मकान में रहते हैं। सोमवार की सुबह हुई बारिश ने पहले ही मकान की जर्जर हालत को और नाजुक बना दिया था। रात करीब 9:30 बजे जब घर के सदस्य अंदर मौजूद थे, तभी 40 से 50 बंदरों का एक विशाल झुंड छज्जे पर चढ़ गया और उत्पात मचाने लगा।
बंदरों के वजन और हलचल को यह पुरानी इमारत झेल नहीं सकी और छज्जा भरभराकर गिर पड़ा। इसके बाद घर की दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गईं। परिवार के सदस्य संभल पाते, उससे पहले ही रात 12 बजे के करीब मकान का आधा हिस्सा तेज धमाके के साथ ढह गया।
बचाव और राहत कार्य
गनीमत रही कि घटना के समय परिवार के सदस्य एक सुरक्षित कोने में थे। वेद प्रकाश का मानना है कि घर में स्थापित देवी मां की बड़ी मूर्ति के पास होने से वे लोग सुरक्षित बच गए। हादसे के बाद पूरी गली में मलबे का अंबार लग गया और आवागमन पूरी तरह बंद हो गया है। सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और नगर निगम को स्थिति से अवगत कराया गया है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या है सबक?
यह घटना कानपुर के पुराने इलाकों में जर्जर हो चुके मकानों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
- प्रशासनिक लापरवाही: बंगाली मोहाल में पिछले कुछ दिनों में यह दूसरी घटना है, जो दिखाती है कि मानसून के दौरान पुराने जर्जर भवनों का सर्वे और उन पर कार्रवाई कितनी जरूरी है।
- बंदरों का बढ़ता आतंक: शहर के घने इलाकों में बंदरों का बढ़ता झुंड अब केवल लोगों को परेशान नहीं कर रहा, बल्कि जान-माल के लिए बड़ा खतरा बन चुका है।
- सुरक्षा के प्रति सतर्कता: जो लोग भी पुराने पुश्तैनी घरों में रह रहे हैं, उन्हें मानसून के दौरान दीवारों में पड़ने वाली छोटी दरारों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।




