कानपुर नगर निगम की कार्यप्रणाली इस वक्त सियासी और प्रशासनिक जंग का अखाड़ा बन गई है। महापौर प्रमिला पांडेय और नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय के बीच अधिकारों को लेकर शुरू हुआ टकराव अब निचले स्तर के कर्मचारियों तक पहुंच चुका है। शनिवार को कर्मचारी संघर्ष समिति ने मोर्चा खोलते हुए पार्षदों द्वारा लाए जा रहे निंदा प्रस्ताव का खुला विरोध किया है।
कर्मचारी संगठनों का शक्ति प्रदर्शन
संयुक्त कर्मचारी संघर्ष समिति के बैनर तले नगर निगम के तमाम कर्मचारी एकजुट हो गए हैं। कर्मचारी नेताओं का साफ कहना है कि नगर आयुक्त के खिलाफ लाया जाने वाला निंदा प्रस्ताव अधिकारियों और कर्मचारियों के मनोबल को गिराने की साजिश है। नेताओं ने दो टूक चेतावनी दी है कि शहर की सफाई और व्यवस्था संभालने वाले कर्मियों का अपमान किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्या है विवाद की असली जड़?
- टेंडर प्रक्रिया पर सवाल: कन्वेंशन सेंटर के टेंडर और मंगल भवन की समितियों को भंग करने को लेकर महापौर और नगर आयुक्त आमने-सामने हैं।
- अधिकारों की जंग: पार्षदों को हॉट मिक्स प्लांट की समितियों से हटाने के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया है।
- बैठक में वाकओवर: हालिया कार्यसमिति बैठक में वकीलों की मौजूदगी पर नगर आयुक्त ने आपत्ति जताई थी, जिसके बाद वे अधिकारियों के साथ बैठक छोड़कर चले गए थे।
मायने और प्रभाव: शहर की जनता पर क्या असर?
इस आपसी खींचतान का सीधा असर कानपुर की विकास परियोजनाओं पर पड़ रहा है। जब महापौर और नगर आयुक्त के बीच तालमेल का अभाव होता है, तो शहर के काम फाइलों में ही दबे रह जाते हैं। नगर निगम के कामकाज में राजनीति का दखल बढ़ने से आम जनता को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं में देरी होना तय है। यदि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच यह ‘अहंकार’ की लड़ाई जल्द खत्म नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में विकास कार्य पूरी तरह ठप हो सकते हैं। कानपुर की जनता अब यह उम्मीद कर रही है कि दोनों पक्ष अपनी निजी मतभेदों को दरकिनार कर शहर हित में काम करेंगे।




