गंगा की निर्मलता पर ‘चोर नाले’ का ग्रहण
नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा को स्वच्छ बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन कानपुर के जाजमऊ से आ रही तस्वीरें इन दावों की कलई खोल रही हैं। यहाँ ‘चोर नाले’ के जरिए रोजाना सैकड़ों लीटर जहरीला और काला गंदा पानी सीधे पवित्र गंगा नदी में समा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस नाले पर निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं, फिर भी यह प्रदूषण का खेल धड़ल्ले से जारी है।
क्या है पूरा मामला?
जाजमऊ क्षेत्र में स्थित इस गुप्त नाले का अस्तित्व तब सामने आया जब पड़ताल में पता चला कि यह जंगल के रास्ते सीधे गंगा तक पहुँच रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस नाले को कभी टैप ही नहीं किया गया। जब एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) बंद होता है, तो सारा गंदा कचरा सीधे नदी में बहा दिया जाता है।
- नाले से महज एक किलोमीटर की दूरी पर 20 एमएलडी का प्लांट और जटेटा कार्यालय मौजूद है।
- निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लेकिन प्रदूषण पर लगाम लगाने में वे पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।
- स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि टेनरी संचालकों और अधिकारियों की मिलीभगत से यह सब हो रहा है।
अधिकारियों की खामोशी और महंत का आरोप
इस गंभीर मामले पर जब जवाबदेही तय करने की कोशिश की गई, तो जटेटा के जिम्मेदार अधिकारी अपने दफ्तरों से नदारद मिले। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी का कहना है कि लखनऊ से टीम जांच के लिए भेजी गई है। दूसरी ओर, जंगलेश्वर बाबा हनुमान मंदिर के महंत दिगंबर अजब आनंदपुरी महाराज ने वीडियो जारी कर आरोप लगाया है कि इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें धमकियां मिल रही हैं।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
कानपुर में गंगा प्रदूषण का यह मुद्दा महज एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। अगर यही हाल रहा तो सरकारी योजनाओं का अरबों का बजट सिर्फ फाइलों में ही गंगा को साफ कर पाएगा। आम जनता के लिए यह इसलिए जरूरी है क्योंकि गंगा का पानी सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह कानपुर के भूजल स्तर और भविष्य की पर्यावरण सुरक्षा से सीधा जुड़ा है। जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय न होना इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम अभी भी जमीन पर काम करने के बजाय कागजी खानापूर्ति पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।





