कानपुर के हरबंश मोहाल इलाके से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है, जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। 68 वर्षीय राकेश सिंह ने जहरीला पदार्थ निगलकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। लंबे समय से चल रही आर्थिक तंगी और बेरोजगारी का दंश इस बुजुर्ग के लिए असहनीय हो गया था।
कामकाज छिनने के बाद घर में पसरा सन्नाटा
राकेश सिंह का परिवार अब गहरे सदमे में है। उनकी पत्नी रानी और इकलौते बेटे सौरभ का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार ने बताया कि राकेश शहर के हमराज कॉम्प्लेक्स स्थित एक कपड़े की दुकान पर काम करते थे, जिससे घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था।
लेकिन कोरोना काल के दौरान उनकी नौकरी क्या छूटी, आर्थिक हालात बद से बदतर होते चले गए। परिवार के मुताबिक, नौकरी जाने के बाद से ही राकेश मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगे थे। कमाई का कोई जरिया न होने की वजह से वे अंदर ही अंदर घुट रहे थे।

अस्पताल में तोड़ा दम
घटना सोमवार की है, जब राकेश ने हताशा में जहरीला पदार्थ निगल लिया। उन्हें आनन-फानन में शहर के हैलट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान बुधवार रात उन्होंने अंतिम सांस ली। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
मायने और प्रभाव: यह मौत हमें क्या सिखाती है?
यह घटना सिर्फ एक परिवार का निजी नुकसान नहीं है, बल्कि यह समाज के उस तबके की कड़वी सच्चाई है जो आज भी बेतहाशा बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के बोझ तले दबा हुआ है।
- मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी: आर्थिक तंगी के दौर में बुजुर्गों का अकेलापन और तनाव अक्सर गंभीर मोड़ ले लेता है, जिसे परिवार और समाज दोनों को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
- सुरक्षा घेरा जरूरी: सरकारी योजनाओं का लाभ उन लोगों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है, जो उम्र के इस पड़ाव पर रोजगार खो चुके हैं? यह सवाल नीति निर्माताओं के लिए एक चुनौती है।
- बदलाव की दरकार: बढ़ती बेरोजगारी सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐसी कई जिंदगियां हैं जो व्यवस्था के आगे हार मान रही हैं।
समाज के तौर पर हमें अपने बुजुर्गों के प्रति अधिक संवेदनशील होने और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि कोई और राकेश सिंह हताशा में ऐसा कदम न उठाए।

