कानपुर के अर्मापुर एस्टेट मैदान में चल रहा मेला गुरुवार रात उस समय मातम में बदल गया जब एक लोकप्रिय ‘जीरो ग्रेविटी’ झूला अचानक अपनी धुरी से टूटकर एक तरफ झुक गया। मेले का अंतिम दिन होने के कारण वहां भारी भीड़ थी, और झूला चलते ही मची चीख-पुकार ने वहां मौजूद लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए। हादसे के वक्त झूले में करीब 35 से 40 लोग सवार थे, जो इस भयावह पल का शिकार हुए।
कैसे हुआ यह खौफनाक हादसा?
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, झूला जैसे ही अपनी पूरी रफ्तार में आया, वैसे ही उसकी संरचना अचानक एक तरफ झुक गई। इसमें सवार युवक-युवतियां एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, जिससे अफरातफरी मच गई। गनीमत रही कि कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई, लेकिन कई लोगों को अंदरूनी चोटें आई हैं। सूचना मिलने पर एडीसीपी वेस्ट योगेश कुमार और एसीपी पनकी अमित चौरसिया मौके पर पहुंचे और तत्काल मेला खाली करवाया।
गीली जमीन और सुरक्षा में सेंध
इस हादसे के पीछे की सबसे बड़ी वजह लापरवाही मानी जा रही है। हालिया बारिश के चलते मैदान की जमीन काफी गीली थी। आरोप है कि प्रबंधन ने बिना ठोस आधार तैयार किए ही गीली मिट्टी में झूले के बोल्ट कस दिए थे। झूला चलते समय दबाव बढ़ते ही ये बोल्ट ढीले पड़ गए, जिससे यह बड़ा हादसा हुआ।
मायने और प्रभाव
कानपुर अर्मापुर मेले की यह घटना प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी: जब भी कोई मेला आयोजित होता है, तो सुरक्षा ऑडिट सबसे जरूरी कदम होता है। क्या गीली जमीन पर ऐसे भारी-भरकम झूलों को अनुमति देना उचित था?
- जिम्मेदारी का अभाव: हादसा होते ही ठेकेदार और कर्मचारी मौके से फरार हो गए, जिससे घायलों के परिजनों को अपने बच्चों को ढूंढने के लिए अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े। यह स्पष्ट करता है कि मेले के आयोजन में जवाबदेही का भारी अभाव है।
- जन सुरक्षा का मुद्दा: त्योहारों के दौरान लगने वाले मेलों में आम जनता उमड़ती है। अगर सुरक्षा मानकों से खिलवाड़ हुआ, तो भविष्य में कोई बड़ी त्रासदी होने से इनकार नहीं किया जा सकता। स्थानीय प्रशासन को अब इन झूला संचालकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।




