इटावा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश का इटावा जिला इन दिनों एक रहस्यमयी वायरल बुखार की चपेट में है। इस बीमारी ने दो मासूमों की जान ले ली है, जबकि आठ अन्य बच्चे अभी भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। जिले के एक गांव में फैली इस बीमारी ने न केवल ग्रामीणों में दहशत पैदा कर दी है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही की पोल भी खोल दी है।
पीएचसी पर लटके ताले, झोलाछापों के भरोसे ग्रामीण
हैरानी की बात यह है कि जिस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) को ग्रामीणों की पहली सुरक्षा दीवार होना चाहिए था, वहां डॉक्टर नदारद मिले। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ओपीडी के समय में भी स्वास्थ्य केंद्र पर ताले लटके रहते हैं। इलाज न मिलने के कारण मजबूरन ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर अनट्रेंड ‘झोलाछाप’ डॉक्टरों के पास जाने को मजबूर हैं।
जांच रिपोर्ट में क्या आया सामने?
- प्रशासन ने अब तक पांच बच्चों के सैंपल लिए हैं।
- डेंगू, टाइफाइड और मलेरिया की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट निगेटिव आई है।
- एहतियात के तौर पर दवाइयां बांटी जा रही हैं, लेकिन बीमारी का सटीक कारण अभी भी अस्पष्ट है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या है खतरा?
यह घटना इटावा की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को दर्शाती है। जब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं होंगे, तो गरीब जनता झोलाछापों के जाल में फंसेगी ही। अगर इस वायरल का प्रसार नहीं रोका गया, तो यह स्थिति और भी भयावह हो सकती है। प्रशासन को तुरंत सक्रिय होकर गांव-गांव में मेडिकल कैंप लगवाने चाहिए, ताकि समय रहते बच्चों की जान बचाई जा सके।




