आतंकवाद पर दोमुंही नीति क्यों?
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर भारत का पक्ष मजबूती से रखा है। उन्होंने न्यूयॉर्क में साफ कर दिया है कि आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का नजरिया भारत के लिए अब भी चिंता का विषय बना हुआ है। जयशंकर का यह बयान तब आया है जब अमेरिका और पाकिस्तान के बीच फिर से बढ़ती नजदीकियां नई बहस छेड़ रही हैं।
क्या है भारत की बड़ी चिंता?
एस जयशंकर का मानना है कि आतंकवाद के खतरों को लेकर अमेरिका की समझ और भारत के अनुभव में जमीन-आसमान का अंतर है। जब अमेरिका पाकिस्तान को सैन्य सहायता या कूटनीतिक समर्थन देता है, तो उसका सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ता है। भारत का स्पष्ट मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘चयनित दृष्टिकोण’ नहीं अपनाया जा सकता।
रिश्तों पर असर
- आतंकवाद पर अमेरिका का रुख भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के बीच एक बड़ी दीवार है।
- पाकिस्तान को मिलने वाली मदद का इस्तेमाल अक्सर भारत के खिलाफ छद्म युद्ध में होता है।
- जयशंकर का संदेश साफ है—भारत अब अपनी सुरक्षा चिंताओं पर कोई समझौता नहीं करेगा।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या?
यह मुद्दा केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि हर भारतीय की सुरक्षा से जुड़ा है। जब वैश्विक महाशक्तियां आतंकवाद पर नरम रुख अपनाती हैं, तो सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और अस्थिरता का सीधा खामियाजा भारत की जनता को भुगतना पड़ता है। जयशंकर की यह ‘दो टूक’ रणनीति यह दर्शाती है कि भारत अब दुनिया को यह बताने से नहीं हिचकिचाता कि उनकी नीतियां हमारे हितों के खिलाफ हैं। आने वाले समय में, अमेरिका के साथ हमारे रिश्तों का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि वे भारत की सुरक्षा चिंताओं को कितनी प्राथमिकता देते हैं।


