मासूम मां को नहीं पता बेटे की शहादत का सच
अलीगढ़ की फिजाओं में आज गम का सन्नाटा है। देश की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले जांबाज जितेंद्र शर्मा का पार्थिव शरीर आज उनके पैतृक गांव पहुंचेगा। घर में कोहराम मचा है, लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि जितेंद्र की बूढ़ी मां को अभी तक यह नहीं पता है कि उनका बेटा अब कभी लौटकर नहीं आएगा। परिवार उन्हें सच बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
प्रशासन की बेरुखी से गांव में आक्रोश
जितेंद्र की शहादत को 24 घंटे से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन इलाके के किसी जिम्मेदार अधिकारी ने अभी तक उनके घर का रुख नहीं किया है। गांव वालों और परिजनों में इस बात को लेकर भारी गुस्सा है। चचेरे भाई पवन शर्मा और बहन कुसुम ने बताया कि उन्होंने प्रशासन के हर स्तर पर—एसडीएम से लेकर ग्राम प्रधान तक—सूचना दी, लेकिन कोई भी सुध लेने नहीं पहुंचा।
अंतिम विदाई की तैयारियां और सरकारी उदासीनता
शहीद के अंतिम संस्कार की तैयारियां गांव में की जा रही हैं, लेकिन प्रशासन की खामोशी एक बड़े सवाल खड़े कर रही है। एक सैनिक जिसने देश के लिए सर्वस्व त्याग दिया, उसके परिवार को इस कठिन घड़ी में अपनों और प्रशासन के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है।
- शहादत का दिन: घटना के 24 घंटे बाद भी अधिकारी नदारद।
- परिजन का दर्द: सूचना देने के बाद भी कोई प्रशासनिक मदद नहीं पहुंची।
- अंतिम संस्कार: आज पूरे राजकीय सम्मान के साथ जितेंद्र को दी जाएगी विदाई।
मायने और प्रभाव: क्या बदलेंगे हालात?
किसी भी शहीद का पार्थिव शरीर आना केवल एक परिवार के लिए दुख नहीं होता, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व और जिम्मेदारी का क्षण होता है। जब प्रशासन की ओर से देरी या उपेक्षा होती है, तो यह देश की सुरक्षा में तैनात जवानों के मनोबल पर चोट करता है। अलीगढ़ प्रशासन की यह कथित लापरवाही स्थानीय स्तर पर बड़ा मुद्दा बन गई है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने शहीदों और उनके परिवारों को वह सम्मान दे पा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं?


