उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और आसपास के जिलों में दशकों से अफीम की खेती आजीविका का बड़ा जरिया रही है। लेकिन इस साल जारी नई अफीम नीति ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सरकार ने उत्पादन का लक्ष्य तो बढ़ा दिया है, लेकिन खेती के नियमों को इतना सख्त कर दिया है कि किसानों के सामने अपनी साख बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
क्या है नया विवाद और चुनौतियां?
हाल ही में जारी नई नीति में अफीम उत्पादन का मानक 4.4 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 5.9 किलो प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है। किसानों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और मौसम की अनिश्चितता के बीच इतने बड़े लक्ष्य को हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। सबसे बड़ी समस्या नीति के समय पर न आने की है, जिससे बुवाई की तैयारियों का कीमती वक्त बर्बाद हो गया है।
लाइसेंस कटने का डर
अफीम की खेती में नियम बहुत सख्त होते हैं। उत्पादन लक्ष्य को पूरा न कर पाने वाले किसानों का लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है। चूंकि इस बार नीति देरी से आई है और लक्ष्यों में भारी बढ़ोतरी हुई है, ऐसे में कई अनुभवी किसान अब लाइसेंस खोने के डर से इस खेती से दूरी बनाने की सोच रहे हैं।
मायने और प्रभाव: किसानों के लिए क्या बदलेगा?
- आर्थिक मार: उत्पादन लक्ष्य पूरा न होने पर लाइसेंस छिनना सीधे तौर पर किसान की आय पर प्रहार है।
- खेती का रकबा: यदि शर्तें आसान नहीं हुईं, तो आने वाले समय में अफीम का रकबा कम हो सकता है, जिससे सीधे तौर पर क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
- नीति का पेच: सरकार की मंशा पैदावार बढ़ाने की हो सकती है, लेकिन धरातल की हकीकत यानी मौसम और संसाधनों को नजरअंदाज करना किसानों के लिए घातक साबित हो रहा है।
स्थानीय किसानों का स्पष्ट कहना है कि यदि लक्ष्यों को व्यावहारिक नहीं बनाया गया, तो अफीम की खेती केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी। अब देखना यह है कि प्रशासन किसानों की इन आपत्तियों पर क्या कदम उठाता है।


