आगरा की सड़कों पर बुधवार का दिन आम नागरिकों के लिए किसी बुरे सपने जैसा रहा। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन और त्योहारों की गहमागहमी के बीच शहर के मुख्य रास्तों पर लगा जाम प्रशासन के तमाम दावों की पोल खोलता नजर आया। स्थिति इतनी विकराल थी कि जिस दूरी को तय करने में सामान्यतः पांच मिनट लगते हैं, वहां लोग एक घंटे तक गाड़ियों में कैद रहे।
एमजी रोड और सेंट जोंस बना ‘ट्रैफिक का केंद्र’
शहर की लाइफलाइन कही जाने वाली एमजी रोड पर गाड़ियों की लंबी कतारें दूर-दूर तक देखी गईं। विशेष रूप से सेंट जोंस चौराहे के पास स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक रही, जहां ट्रैफिक का दबाव इतना था कि पुलिस कर्मियों को भी हालात संभालने में पसीने छूट गए। लोग अपने घरों और दफ्तरों तक पहुँचने के लिए घंटों तक सड़कों पर जूझते रहे।
क्यों फेल हुआ डायवर्जन प्लान?
प्रशासन ने विसर्जन और त्योहारों को देखते हुए यातायात व्यवस्था में बदलाव किया था। हालांकि, यह डायवर्जन प्लान धरातल पर पूरी तरह फेल साबित हुआ। मुख्य समस्याओं में ये शामिल रहे:
- यमुना किनारा मार्ग पर अतिरिक्त वाहनों का अचानक दबाव।
- विसर्जन जुलूसों के लिए तय रास्तों का सही प्रबंधन न होना।
- ट्रैफिक सिग्नल और डायवर्जन पॉइंट्स पर पर्याप्त पुलिस बल की कमी।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या असर?
यह जाम केवल एक दिन की परेशानी नहीं, बल्कि शहर की बुनियादी ढांचागत कमजोरियों को उजागर करता है। जब भी कोई बड़ा त्यौहार आता है, आगरा का ट्रैफिक सिस्टम अक्सर चरमरा जाता है, जिसका सीधा असर स्कूली छात्रों, अस्पताल जाने वाले मरीजों और नौकरीपेशा लोगों पर पड़ता है।
प्रशासन को अब ‘रिएक्टिव’ की जगह ‘प्रोएक्टिव’ ट्रैफिक मैनेजमेंट की जरूरत है। यदि त्योहारों के सीजन में इसी तरह सड़कों पर आम आदमी का समय बर्बाद होता रहा, तो शहर की आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जनता की मांग है कि भविष्य में विसर्जन के दौरान ट्रैफिक रूट को पहले से अधिक वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन किया जाए।




