कानपुर के संभागीय परिवहन कार्यालय (RTO) में उस समय हड़कंप मच गया जब उप परिवहन आयुक्त (DTC) ने अचानक दस्तक दी। यह दौरा महज एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि सालों से पेंडिंग फाइलों और कार्यालय की कार्यप्रणाली को पटरी पर लाने की एक कोशिश थी।
बाबूगिरी की खुली पोल
निरीक्षण के दौरान DTC ने सीधा फोकस बाबूओं के टेबल पर लंबित फाइलों पर रखा। कई पटलों पर फाइलों का अंबार देख अधिकारी ने सख्त नाराजगी जताई। यह देखा गया कि काम समय पर न होने की वजह से आवेदकों को बार-बार चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जो सीधे तौर पर विभागीय लापरवाही को दर्शाता है।
सीधी बात, साफ जवाब
अधिकारी ने सिर्फ कागजों की जांच ही नहीं की, बल्कि परिसर में मौजूद आम जनता से भी सीधे बात की। आवेदकों ने दलालों के हस्तक्षेप और फाइलों के अटके रहने की समस्याएं गिनाईं। डीटीसी ने मौके पर ही मौजूद स्टाफ को हिदायत दी कि किसी भी आवेदक को बिना ठोस कारण परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या बदलेगा?
कानपुर जैसे बड़े शहर में RTO का काम रोजमर्रा की जरूरत है। इस औचक निरीक्षण के बाद कुछ अहम बदलाव देखने को मिल सकते हैं:
- कार्यक्षमता में सुधार: फाइलों के पेंडिंग रहने की दर में कमी आएगी।
- पारदर्शिता: बाबूओं की मनमानी पर लगाम लगेगी और काम के लिए अनावश्यक देरी नहीं होगी।
- सुविधा का विस्तार: आम नागरिकों को अपना काम करवाने के लिए दलालों के चंगुल से मुक्ति मिल सकती है।
यह दौरा संकेत है कि प्रशासनिक व्यवस्था अब ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। अगर यह सख्ती बरकरार रही, तो कानपुर के वाहन चालकों और वाहन मालिकों को कार्यालय के चक्कर लगाने से बड़ी राहत मिल सकती है।


